
तेलंगाना, जो देश के सबसे बड़े चावल उत्पादक राज्यों में से एक है, वहां किसान अल नीनो की वजह से सूखे से जूझ रहे हैं. कई किसानों ने अल नीनो के असर के बारे में बताया और कहा कि उन्हें कई दूसरी फसलों की ओर रुख करना पड़ा है क्योंकि सिंचाई के लिए पानी की घोर कमी है. इस बार मॉनसून ने दक्षिण भारत के लगभग सभी राज्यों में बेरुखी दिखाई है जिससे बारिश की बहुत कमी है. इसका सबसे बड़ा प्रभाव धान की खेती पर देखा जा रहा है क्योंकि यह राज्य धान के लिए प्रमुखता से जाना जाता है. यहां के किसान धान की फसल को अपनी रोजी-रोटी और कमाई का सबसे बड़ा साधन मानते हैं. लेकिन इस बार संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
ऐसे ही एक किसान हैं हरीश जिनका परिवार पीढ़ियों से चावल की खेती कर रहा है. इस साल उन्होंने धान की जगह मोटे अनाज (मिलेट) की खेती करने का फैसला किया, क्योंकि मॉनसून के कमजोर रहने की चेतावनी पहले ही मिल गई थी. सरकार ने किसानों से अधिक पानी की जरूरत वाली चावल की खेती छोड़कर कम समय में तैयार होने वाली और सूखे का सामना कर सकने वाली किस्मों की खेती करने अपील की थी.
किसान हरीश कहते हैं, "हमने मोटे अनाज जैसी फसलों की बुवाई के बारे में बेहतर जानकारी के लिए सरकार के एक सेशन में हिस्सा लिया. उन्होंने समझाया कि यह कैसे काम करता है और इसे कैसे करना चाहिए. हमने इसे आजमाने का फैसला किया."
इमरजेंसी योजना के तहत, सरकार ने किसानों से संपर्क किया और उन्हें 'अल नीनो' के असर के बारे में बताया. 'अल नीनो' प्रशांत महासागर का एक प्राकृतिक मौसम पैटर्न है जो दुनिया भर में तापमान बढ़ाता है. किसानों को सही फैसला लेने में मदद करने के लिए बांधों में पानी के भंडार और पानी की उपलब्धता की जानकारी सार्वजनिक की गई.
सिंचाई और अल नीनो पर असर को देखते हुए कृषि अधिघारी रामप्रसाद ने कहा, "हम वैज्ञानिकों के साथ चर्चा कर रहे हैं कि 'अल नीनो' के असर से निपटने के लिए कौन सी फसलें सही रहेंगी. हम किसानों को इन फसलों की बुवाई के लिए समझा रहे हैं." यहां के किसानों का कहना है, "सिर्फ अभी ही नहीं, बल्कि आने वाले सालों में भी लोग धान छोड़कर मोटे अनाज की खेती की ओर बढ़ेंगे. वे ज्वार और दालों की खेती शुरू करेंगे. हम लोगों में जागरुकता भी फैला रहे हैं."
लेकिन राघवन जैसे किसानों के लिए, केवल सलाह ही खेती बदलने के लिए काफी नहीं थी. धान के उलट, कई वैकल्पिक फसलों के लिए सरकार की तरफ से कोई पक्का समर्थन मूल्य (MSP) नहीं मिलता, जिससे यह फैसला करना मुश्किल हो जाता है. एक किसान ने कहा कि अगर वे मूंग, ज्वार या मक्का की खेती करते हैं, तो कोई सब्सिडी नहीं मिलती. अब तक सरकार ने उन्हें कोई मदद नहीं दी है."
इसका समाधान आदिवासी महिला किसानों के पास है, जिन्हें 'बीज संरक्षक' के तौर पर जाना जाता है. पिछले कुछ सालों में उन्होंने बीजों की लगभग 100 किस्में बचाकर रखी हैं. 'अल नीनो' वाले इस साल में, वे उन किसानों के लिए सलाहकार की भूमिका निभा रही हैं जो अलग-अलग तरह की फसलें उगाना चाहते हैं और जलवायु के हिसाब से खुद को ढालने वाली फसलें उगाना चाहते हैं.
रामदास नाम के एक आदिवासी किसान ने बताया कि "मैंने लगभग 20 लोगों की मदद की. मैंने उन्हें बीज दिए और सिखाया कि अपने बीजों को कैसे बचाकर और सुरक्षित रखकर रखना है."
2023 से, सरकार ने मोटे अनाज को 'सुपरफूड' के तौर पर बढ़ावा दिया है, जिससे शहरी भारत में इन अनाजों की मांग बढ़ रही है. ऐसी महिला किसान अब चावल जैसी अधिक पानी लेने वाली फसलों के टिकाऊ विकल्प के तौर पर मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती की ओर बढ़ रही हैं.
हालांकि उन किसानों के लिए वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है जो कई साल से धान जैसी फसल उगा रहे हैं और अच्छी कमाई कर रहे हैं. लेकिन अल नीनो के असर को देखते हुए उन्हें मोटे अनाजों जैसी फसल की खेती करने के लिए अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है.