
बकरी पालन का प्लान दिमाग में आते ही सबसे पहले जो दो कारोबार आते हैं वो दूध और मीट का है. और इस प्लान को जमीन पर उतारने के लिए फिर शुरुआत होती है बकरे-बकरियों की अच्छी नस्ल तलाश करने की. एक ऐसी नस्ल जो दूध ज्यादा दे, जिसका मीट भी अच्छा हो, और तो और जो दूसरी नस्ल के मुकाबले बच्चे भी ज्यादा देती हो. अगर एक ही बकरी में तीनों खूबी नहीं भी हों तो कम से कम दूध और मीट वाली दो खूबी तो होनी ही चाहिए. इसके साथ ही वो नस्ल ऐसी होनी चाहिए जो उस वातावरण में भी ढल सके जहां उसे पाला जाएगा. अगर आप ये सब सोच रहे हैं तो फिर टेंशन फ्री हो जाइए. बत्तीसी नस्ल आपकी सारी परेशानियों को दूर कर देगी.
यूपी और राजस्थान में ऐसी कोई बकरी नहीं है जो 2.5 से 3 लीटर तक दूध देती हो. साथ ही इस नस्ल के बकरे-बकरी मीट के लिए भी खूब पाले जाते हैं. हाल ही में वेटरनरी यूनिवर्सिटी दुवासू, मथुरा ने बकरियों की इस बत्तीसी नस्ल पर एक लम्बी रिसर्च की है. दुवासू के वाइस चांसलर डॉ. अभिजीत मित्रा की साइंटिस्ट टीम की इस रिसर्च के बाद ही इस खास नस्ल को नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्स (NBAGR) की लिस्ट में शामिल किया गया है. ब्रज नस्ल के एक गधे को भी दुवासू ने इस लिस्ट में रजिस्टर्ड कराया है.
दुवासू के प्रो. डॉ. एसपी सिंह ने किसान तक को बताया कि बकरियों की खास नस्ल बत्तीसी मूल रूप से पथरीले और कांटेदार पहाड़ी इलाकों में रहने वाली नस्ल है. ये बकरियों में बेहद फुर्तीली नस्ल है. साथ ही ये नस्ल झाड़ियों के बीच से घास-पत्तियां चरने में माहिर है. यही वजह है कि इस नस्ल के बकरे-बकरियां बहुत ही कम लागत में पल जाते हैं. पहाड़ी और कटीले इलाके में चरने की वजह से कुछ बकरी पालक इसके कान और पूछ को थोड़ा सा काट देते हैं.
जिससे की कटीली झाडि़यों के बीच फंसकर इसे चोट न लगे. इसे खास सफेद रंग और उस पर काले धब्बों या धारियों से आसानी से पहचाना जा सकता है. धब्बे या धारियां खासकर चेहरे, छाती, पेट और पैरों के पास होते हैं. इसका शरीर मजबूत और गठिला होता है. यूपी, राजस्थान और हरियाणा में इसे खासतौर पर दूध और मीट के लिए पाला जाता है.
डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि बत्तीसी ऐसी नस्ल है जिसकी बकरी हर रोज 2.5 से 3 लीटर तक दूध देती है. कई ऐसे किसानों से बात हुई है जो इस नस्ल की बकरी से इतना दूध ले रहे हैं. अगर सामान्य बकरी की भी बात करें तो वो 1.8 लीटर से लेकर 2 लीटर तक दूध हर रोज बड़े ही आराम से दे रही हैं. मीट के लिए भी इसे मजबूत कद-काठी का माना जा रहा है. अगर प्रजनन की बात करें तो ज्यादातर मामलों में ये एक बार में 2 बच्चे देती है. कुछ केस में तीन बच्चे तक भी दे देती है. वर्ना तो हर साल 4 बच्चे तय हैं.
डॉ. एसपी सिंह बताते हैं कि बकरी की नस्ल का बत्तीसी नाम सुनकर बड़ा अजीब लगता है. लेकिन इसका बत्तीसी नाम ऐसे ही नहीं पड़ा है. बत्तीसी नाम के पीछे वजह है कि अलवर, राजस्थान के 32 गांवों में इस नस्ल के बकरे-बकरियों को खूब पाला जाता है. बस इसी के चलते इस नस्ल का नाम बत्तीसी पड़ गया है. और अब बत्तीसी नाम से ही इस नस्ल को NBAGR की लिस्ट में शामिल कराया गया है.
सीधी पीठ और रंग में सफेद-ग्रे, अभी तक इस गधे की यही पहचान थी. सीधी पीठ के चलते ही इस नस्ल के गधे को सबसे ज्यादा वजन ढोने के काम में इस्तेमाल किया जा रहा है. ईंट भट्ठों और बिल्डिंग मैटेरियल की ढुलाई के लिए भी इसी नस्ल को बहुत इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन डॉ. एसपी सिंह की कोशिशों के चलते ये पहला मौका होगा जब इस नस्ल को एक नाम मिलेगा. गधे की इस नस्ल को भी NBAGR की लिस्ट में शामिल कराया गया है. और इसे ब्रज नाम दिया गया है. ब्रज नाम देने के पीछे वजह ये है कि इस नस्ल के गधे खासतौर से आगरा और मथुरा में बहुत पाए जाते हैं. अगर पशुगणना 2019 की बात करें तो इस नस्ल के गधों की संख्या करीब 16 हजार थी. कद-काठी के मामले में इस नस्ल के गधे लद्दाख, स्पीति, रायलसीमा के भूरे रंग वाले गधों और गुजरात के रजिस्टर्ड हलारी गधे से बहुत अलग है.
डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक व्यवहार संबंधी शोध से पता चला है कि गधों में सीखने, याद रखने और समस्याओं को सुलझाने की अच्छी क्षमता होती है. इन्हें कम अक्ल और बेवकूफ मानना गलत है और इनका व्यवहार और इनके काम इसे चुनौती भी देते हैं. इस दावे को पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में यात्रा के काम में लगे गधे चुनौती भी देते हैं.
डॉ. एसपी सिंह का ये भी कहना है कि साइंस में गधों के संभावित पोषण संबंधी, हाइपोएलर्जेनिक, एंटीमाइक्रोबियल, एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के बारे में बताया गया है. साबुन, क्रीम और दूसरे कॉस्मेटिक और पर्सनल-केयर प्रोडक्ट के जरिए वैल्यू एडिशन के लिए भी इसमें दिलचस्पी दिखाई जा रही है. भारत में पहले ही गधों के व्यवस्थित पालन और कॉस्मेटिक उत्पादों के लिए गधी के दूध के इस्तेमाल से जुड़े बिजनेस किए जा रहे हैं. अगर जानवरों की भलाई, साफ-सुथरे तरीके से दूध निकालने और सही प्रोसेसिंग पर ध्यान देते हुए वैज्ञानिक तरीके से ऐसे अलग-अलग काम शुरू किए जाएं, तो पारंपरिक रूप से गधे पालने वालों के लिए कमाई के नए मौके बन सकते हैं. इस प्रोजेक्ट के प्रधान अन्वेषक डॉ. अवनीश कुमार और विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. दीपक शर्मा की मानें तो इस लिस्ट में शामिल होने से दोनों नस्ल को बहुत फायदा मिलेगा.
ये भी पढ़ें-
Milk Adulteration: दूध में पानी मिलाया है या पूरा दूध ही सिंथेटिक है, खुद से ऐसे करें जांच
Goat Farming: तेजी से बढ़ रही है बकरी पालन करने वालों की संख्या, ये हैं वो 20 वजह