
केरल की स्थानीय पेरियार मवेशी नस्ल को अब देशी नस्ल के तौर पर आधिकारिक पहचान मिल गई है. आईसीएआर-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने पेरियार गाय को केरल की नई स्वदेशी नस्ल के रूप में रजिस्टर करने की मंजूरी दी है. यह फैसला लंबे समय से इसके संरक्षण में जुटे किसानों के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. आईसीएआर की ब्रीड रजिस्ट्रेशन कमेटी की 8 अगस्त को हुई बैठक में पेरियार मवेशी के रजिस्ट्रेशन को मंजूरी दी गई. ब्यूरो के निदेशक ने 18 अगस्त को केरल के पशुपालन विभाग के निदेशक को पत्र भेजकर इसकी आधिकारिक जानकारी दी.
लोकल लेवल पर इस नस्ल को ‘पेरियार कुल्लन’ यानी पेरियार बौना मवेशी कहा जाता है. किसानों का कहना है कि आधिकारिक पहचान मिलने से इस स्थानीय नस्ल के संरक्षण और विस्तार को बढ़ावा मिलेगा. इसे केरल की एक अन्य देशी बौनी नस्ल वेचूर की तरह पहचान और संरक्षण मिलने की उम्मीद है.
कोडानाड गांव के निवासी कोसे कुरियन ने बताया कि इस नस्ल के संरक्षण की कोशिश 2017 में शुरू हुई थी. जिस स्कूल में वह काम करते थे, वहां छात्रों ने एक प्रदर्शनी के दौरान इस स्थानीय गाय पर रिपोर्ट पेश की थी. इसके बाद उन्होंने खुद पेरियार नस्ल के मवेशी पालने शुरू किए और किसानों का एक समूह बनाकर संरक्षण अभियान आगे बढ़ाया.
कुरियन के मुताबिक, संरक्षण अभियान शुरू होने के बाद इस क्षेत्र में पेरियार मवेशियों की संख्या बढ़कर करीब 2,500 हो गई है. फिलहाल वह खुद करीब 80 गाय पाल रहे हैं. किसानों का एक सामुदायिक संरक्षण समूह भी इस नस्ल को बढ़ाने में जुटा है.
पेरियार मवेशी मुख्य रूप से इडुक्की और एर्नाकुलम जिलों में पेरियार नदी के किनारे और वन क्षेत्रों के आसपास पाए जाते हैं. ये मवेशी जंगल के आसपास चरते हैं और घास पर निर्भर रहते हैं. किसानों के अनुसार, इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर मानी जाती है.
पेरियार गाय आमतौर पर रोजाना करीब दो से तीन लीटर दूध देती है. स्थानीय स्तर पर इसके दूध की कीमत करीब 100 से 120 रुपये प्रति लीटर तक बताई गई है. किसान इसे पौष्टिक और औषधीय गुणों वाला मानते हैं, जिसके कारण स्थानीय बाजार में इसकी मांग बनी हुई है.
कुरियन के अनुसार, इस नस्ल को पालने के लिए दूसरी नस्लों की तरह बड़े पशु शेड की जरूरत नहीं पड़ती. ये मवेशी खुले में चर सकते हैं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल माने जाते हैं. यही वजह है कि किसान इसे कम लागत में पालने वाली नस्ल के तौर पर देखते हैं.
पेरियार मवेशी पर राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने 2018 से अध्ययन शुरू किया था. इस काम में केरल पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय ने भी सहयोग किया. इन अध्ययनों के बाद नस्ल को आधिकारिक तौर पर देशी नस्ल के रूप में मान्यता देने की प्रक्रिया आगे बढ़ी.
नस्ल को बचाने के लिए केरल जैव विविधता बोर्ड ने इसके सांडों से सीमेन भी एकत्र किया है. संरक्षण समूह स्थानीय स्तर पर किसानों को कम कीमत पर युवा मवेशी उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है. किसानों को उम्मीद है कि आधिकारिक दर्जा मिलने के बाद सरकारी सहायता, शोध और संरक्षण कार्यक्रमों का दायरा बढ़ेगा. (पीटीआई)