
यूपी, मध्य प्रदेश और हरियाणा अक्सर आपने गाय और भेड़ के झुंड देखे होंगे. हजारों की संख्या में गाय-भेड़ के ये झुंड सड़क पर या खेत में देखने को मिल जाते हैं. देखने में जितने आकर्षक पशुओं के ये झुंड लगते हैं उसी तरह से इन्हें हांकने वाले चरवाहे भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं. सफेद कपड़े और लाल रंग की पगड़ी, पहनावे का ये रंग ही इनकी पहचान भी है. सात-आठ दिन नहीं पूरे आठ महीने तक ये लोग अपने पशुओं के साथ अपने गांव-शहर और राज्य से बाहर रहते हैं. राजस्थान के अलग-अलग शहरों में रहने वाले ये लोग देवासी समाज से ताल्लुक रखते हैं. हरे चारे और पानी की किल्लत के चलते इन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ता है.
ऐसा ना करें पशुपालन करना और घर चलाना दोनों ही मुश्किजल हो जाते हैं. आठ महीने के लिए सड़क और खेत ही इनका घर-बहार होता है और यही से पशुओं का कारोबार चलता है. इसीलिए इन्हें चलती-फिरती डेयरी भी कहा जाता है. समाज में कोई शादी-ब्याह होने या फिर और किसी काम के चलते बीच में घर का चक्कर लग जाए तो अलग बात है, वर्ना शिफ्ट में काम चलता रहता है. तीन भाई हैं तो दो-दो, ढाई-ढाई महीने के हिसाब से शिफ्ट बांट लेते हैं.
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पाली, राजस्थान के रहने वाले पशुपालक हरीश ने किसान तक को बताया कि फरवरी-मार्च में हम अपने घर से निकल आते हैं. क्योंकि यही वो वक्त होता है जब हमारे गांवों में हरे चारे और पानी की कमी शुरू हो जाती है. गायों का चारा और पानी लगातार मिलते रहे इसलिए हम अपने गांव और शहरों के सीमावर्ती राज्यों में सुविधानुसार यूपी, हरियाणा और मध्य प्रदेश में दाखिल हो जाते हैं. क्योंकि इन्हीं पशुओं से हमारा भी पेट भरता है तो पहले इनका पेट भरने की तैयारी करनी होती है. उदाहरण के तौर पर जैसे कुछ लोग रेवड़ लेकर महेन्द्रगढ़ बार्डर के रास्ते हरियाणा में दाखिल हो जाते हैं. फिर रेवाड़ी, मानेसर और गुड़गांव होते हुए करनाल की तरफ निकल जाते हैं. तब तक सितम्बर-अक्टूबर आ जाता है. ये वो महीना होता है जब हमारे समाज के पशुपालक गांवों की ओर लौटना शुरू कर देते हैं.
हरीश के मुताबिक 150 से 200 गायों के एक झुंड को रेवड़ कहा जाता है. दो लोग मिलकर एक रेवड़ को संभालते हैं. किसी भी एक शहर में 10 से 12 रेवड़ होते हैं. हर एक शहर में ऐसे ही रहते हैं. सभी एक जगह जमा नहीं होते हैं. अगर सभी एक जगह जमा हो जाएंगे तो उस शहर में भी पशुओं के लिए चारे की कमी हो जाएगी. सड़क पर चलते वक्त गायों को सभालना मुश्किल काम होता है. क्योंकि सड़क पर चलने वाले वाहनों को कोई परेशानी न हो इसका ख्याल रखना पड़ता है. हालांकि कई बार हमे गालियों का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन मजबूरी है क्या करें. एक गांव में हम दो से तीन दिन तक रुकते हैं. हालांकि ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि वहां हरा चारा कितना है. इसी हिसाब से हम धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते रहते हैं.
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