
कुछ साल पहले तक बांस के पौधे को जंगल में उगे एक खरपतवार के रूप में ही देखा जाता था. या बहुत ज्यादा हुआ तो खासतौर से नॉर्थ-ईस्ट में बांस को फेंसिंग के रूप में बहुत इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन अब बांस की तस्वीर बदल चुकी है. बांस अब सिर्फ एक खरपतवार नहीं रहा है. बांस की खेती हो रही है. न सिर्फ नॉर्थ-ईस्ट में बल्कि देश के ज्यादातर राज्यों में खुद केन्द्र सरकार बांस की खेती को बढ़ावा दे रही है. अच्छी बात ये है कि बांस का एक लम्बा-चौड़ा बाजार तैयार हो गया है. बाजार ने बांस की खेती करने वालों की तकदीर बदल दी है. होटल-रेस्टोरेंट, घर और यहां तक की छोटी से लेकर बड़ी इंडस्ट्री तक में चारों तरफ बांस ही बांस नजर आने लगा है.
जबकि छह साल पहले की बात करें तो कुछ खास जगहों पर ही बांस का इस्तेमाल दिखाई देता था. अब तो अगर बाजार में आप जिस चम्मच से आइसक्रीम खा रहे हैं वो भी बांस के बने आ रहे हैं. ढेल पर चाऊमीन भी बांस के बने चम्मच और कांटे से खाई जा रही है. चाय-कॉफी में चीनी भी बांस की बनी स्टिीक से मिलाई जा रही है. यहां तक की इंटीरियर के कारोबार में भी बांस अपनी जगह बना चुका है. बाजार में जगह-जगह बांस के बने शोपीस आइटम बिकते हुए दिखाई दे जाते हैं.
आईएचबीटी के साइंटिस्ट डॉ. रोहित मिश्रा की मानें तो कुछ वक्त पहले तक चाउमीन, आइसक्रीम, और जूस-शेक को मिलाने के लिए प्लास्टिक के चम्मच-कांटे और स्टिक का इस्तेमाल करते थे. लेकिन अच्छी बात ये है कि प्रदूषण फैलाने वाले प्लास्टिक के वो आइटम बाजार से काफी हद तक बाहर हो गए हैं. उनकी जगह अब बांस ने ले ली है. बांस के बने चम्मच -कांटे और स्टिक आ रहे हैं. इतना ही नहीं जिस अगरबत्ती के कारोबार में लकड़ी की बनी स्टिक का इस्तेमाल किया जाता था, वहां भी अब बांस की स्टिक अगरबत्ती में लगाई जा रही हैं. मोसो बांस अगरबत्ती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इसकी एक बड़ी खासियत ये भी है कि यह जलने पर कम कार्बन मोनो ऑक्साइड छोड़ता है.
डॉ. रोहित मिश्रा का कहना है कि आजकल बांस के पौधे घर में भी खूब सजाए जा रहे हैं. इन्हें ऑर्नामेंटल बैम्बू कहा जाता है. इसकी छह वैराइटी आती हैं. फूलों के मुकाबले इनकी केयर भी कम करनी होती है. पानी भी कम ही इस्तेमाल होता है. जैसे एक बांस की बेल आती है. इसे डाइनाक्लोबा के नाम से जाना जाता है. एक घास जैसा बांस भी आता है. इसे सासा ओरीकोमा कहते हैं. डेंट्रोकैलिमा जाइगेंटियस बांस की बात करें तो बांस की वैराइटी में ये सबसे मोटा और ऊंचा बांस है. इसकी लम्बाई 80 फीट तक होती है.
रोहित मिश्रा ने बताया कि बांस का अचार बिकना और खाना तो आम बात है. लेकिन बांस की सब्जी भी खाई जा रही है और बांस का मुरब्बा भी बनाया जा रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी एक खास बांस की सब्जी बनाई जाती है या फिर उसका अचार डाला जाता है. असल में बहुत सारे बांस है जिनकी सब्जी भी खाई जाती है और उसका मुरब्बा भी बनाया जाता है. होता ये है कि जब बांस हरे रंग का होता है तो उसके ऊपर सफेद रंग की नई कोपल आती हैं. बस इसी सफेद रंग की कोपल को खाया और पकाया जाता है. इसमे मिनरल्स काफी मात्रा में पाए जाते हैं.
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