गाय-भैंस जब बच्चा देती हैं तो उसकी भी खुशी मनाई जाती है. बछिया पैदा होने पर ये खुशी बढ़ जाती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि अगर बछड़ा (नर) पैदा होता है तो वो मुनाफा नहीं कराता है. लेकिन इस खुशी के साथ ही पशुपालकों की चिंता भी बढ़ जाती है. और ये चिंता होती है पैदा होने वाले बच्चों की मृत्यु दर को लेकर. एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो देखभाल में जरा सी भी लापरवाही होने पर जन्म के साथ ही बच्चों की मौत तक हो जाती है. लेकिन बच्चों की मृत्यु दर को कम करने के साथ ही उस पर रोक भी लगाई जा सकती है. जब गाय-भैंस बच्चा देने वाली होती है तो पहले से ही कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं. और जब गाय-भैंस बच्चा देने वाली हो तो उसके बच्चे के खानपान और उम्र के हिसाब से शेड की तैयारी की जानी चाहिए.
एनिमल साइंस से जुड़े साइंटिस्ट का पूरा जोर इस बात पर रहता है कि पशुपालन में बच्चों की मृत्यु दर कम से कम हो. क्योंकि रिप्रोडक्शन (प्रजनन) और दूध उत्पादन से ही पशुपालक को मुनाफा होता है. गाय-भैंस हो या फिर भेड़-बकरी रिप्रोडक्शन से ही इनका कुनबा बढ़ता है. क्योंकि यही बच्चा बड़ा होने के बाद पशुपालक को मुनाफा कराएगा. बच्चा अगर फीमेल है तो बड़े होकर दूध देकर कमाई कराएगा. मेल है तो उसे ब्रीडर बनाकर या मीट के लिए बेचकर पैसा कमाया जा सकता है.
बच्चे के जन्म लेते ही करें ये काम
- जन्म के बाद बच्चे को ज्यादा वक्त भैंस के सामने रखें.
- बच्चा सामने हो तो भैंस उसे चाटकर साफ करती है.
- बच्चे को चाटने से बच्चे की त्वचा जल्दी सूख जाती है.
- भैंस बच्चे को चाटती है तो उसका तापमान नहीं गिरता है.
- चाटने से शरीर साफ होता है और खून दौड़ने लगता है.
- बच्चे को चाटने से भैंस को सॉल्ट और प्रोटीन मिलता है.
भैंस नहीं चाटे तो करें ये जरूरी काम
- भैंस बच्चे को नहीं चाटे तो साफ तौलिए से रगड़ दें.
- जन्म के फौरन बाद बच्चे के ऊपर से जेर-झिल्ली हटा दें.
- बच्चे को सांस लेने में परेशानी हो तो उसकी छाती की मालिश कर दें.
- ठीक से सांस ना आने पर बच्चे की पिछली टांगें पकड़ कर उल्टा लटकाएं.
- नये ब्लेड या गर्म पानी में साफ की गई कैंची से बच्चे की नाल काट दें.
- जिस जगह से नाल काटी गई है वहां टिंचर आयोडीन लगा दें.
बच्चे को बीमारी से लड़ने की ताकत देगी खीस
- जन्म के एक-दो घंटे के अंदर बच्चे को भैंस की खीस जरूर पिलाएं.
- बच्चे को खीस पिलाने के लिए भैंस की जेर गिरने का इंतजार ना करें.
- वक्त रहते बच्चे को पिलाया गया खीस उसे बीमारियों से लड़ने में मदद करता है.
- बच्चे को उसके वजन का 10 फीसद दूध पिलाना चाहिए.
- बच्चे को सुबह-शाम दो बार में दूध पिलाना चाहिए.
- पहला दूध पीने के बाद बच्चे का दो घंटे के अंदर गोबर करना जरूरी है.
- मौसम के मुताबिक बच्चे को ज्यादा सर्दी-गर्मी से बचाने का इंतजाम करें.
- 10 दिन की उम्र पर बच्चे को पेट के कीड़ों की दवा जरूर पिला दें.
- पेट के कीड़ों की दूसरी खुराक बच्चे को 21 दिन की उम्र पर पिलाएं.
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