
पशुपालन में चारे की कमी और उसके बढ़ते रेट की परेशानी किसी एक मौसम की नहीं है. अब साल के 12 महीने ही किसी न किसी तरह से चारे की परेशानी रहती ही है. और अब तो ये परेशानी इतनी बड़ी हो चुकी है कि पशुपालन और डेयरी पर ही खतरा मंडराने लगा है. खासतौर से चार-पांच गाय-भैंस वाले पशुपालकों के लिए चारा बड़ी परेशानी बन चुका है. चारे की कमी और उसके महंगा होने के चलते ही दूध की लागत बढ़ रही है. चारे की परेशानी का असर डेयरी प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट पर भी दिखाई देने लगा है.
एक्सपर्ट की मानें तो डेयरी में सभी तरह के चारे की कमी महसूस की जा रही है. चारा कमी की दर लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि डेयरी एक्सपर्ट लगातार सरकार को सुझाव दे रहे हैं कि चारे में मदद देकर सरकार डेयरी और पशुपालन सेक्टर की वक्त के साथ बड़ी हो रही परेशानी को खत्म कर सकती है. क्योंकि देश में अब चारे की जमीन भी कम होती जा रही है.
फिरोज अहमद, चारा एक्सपर्ट और डॉयरेक्टर, कॉर्नेक्स्ट एग्री प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड का कहना है कि इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि डेयरी लागत को कैसे कम किया जाए. इसके लिए एक सबसे बड़ा काम ये किया जा सकता है कि डेयरी पशुओं की खुराक में पोषण को अहमियत दी जानी चाहिए. चारे की उत्पादकता बढ़ाई जाए. विपरीत हालात में भी पशुओं के लिए चारे की कमी ना हो और सप्लाई लगातार बनी रहे इसके लिए क्षेत्रीय चारा बैंक और स्टोरेज गोदाम बनाने पर काम करने की जरूरत है.
चारा उत्पादक किसान क्वालिटी का चारा उत्पादन कर सकें इसके लिए के चारा और चारा बीजों की सप्लाई में सुधार के लिए राज्यस्तर पर योजनाएं बनानी होंगी. बरसीम जैसे फलीदार बीजों की घरेलू स्तर पर उपलब्धता बढ़ानी होगी. इतना ही नहीं नॉन फारेस्ट बंजर जमीन, चरागाह और सामुदायिक जमीन का इस्तेमाल पशुओं के हरे चारे की खेती करने को बढ़ावा देना होगा.
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