
साल 2026 में चौतरफा झींगा पालन मुश्किलों से घिर गया है. मौजूदा हालात ने झींगा पालकों की टेंशन बढ़ा दी है. झींगा पालन से लेकर बाजार में उसे बेचने तक के हर मोर्चें पर झींगा पालने वाले किसान दबाव में आ गए हैं. झींगा पालन की लागत बढ़ने से उसे बाजार में बेचना मुश्किल हो गया है. दूसरी ओर सस्ते प्रोटीन की चाहत में ग्राहक झींगा को छोड़ दूसरे प्रोडक्ट पर शिफ्ट होने लगे हैं. पालन से लेकर बाजार तक में आने वाली परेशानियों ने खासतौर पर छोटे झींगा पालकों को सबसे ज्यादा परेशान किया है. झींगा एक्सपर्ट की मानें तो अगर मौजूदा हालात में जल्द बदलाव नहीं आया तो छोटे किसान झींगा पालन से बाहर हो सकते हैं.
वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार ने जानकारी दी है कि भारत से झींगा खरीदने वालों की लिस्ट में बदलावा आया है. यूरोप, वियतनाम और चीन ने अपनी डिमांड बढ़ा दी है. अमेरिका की कम डिमांड की भरपाई यूरोप, वियतनाम और चीन से हो जा रही है. और अच्छी बात ये है कि झींगा एक्सपोर्टर अब कुछ चुनिंदा खरीदारों पर निर्भर रहने के बजाय झींगा के विदेशी बाजारों की लिस्ट को बढ़ाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
झींगा किसान और एक्सपर्ट डॉ. मनोज शर्मा ने किसान तक को बताया कि आज झींगा किसान सिर्फ तालाब में झींगा पालन से ही नहीं उसे बाजार में बेचने जैसी परेशानियों से भी जूझ रहा है. लागत इतनी बढ़ चुकी है कि झींगा की लागत निकालना मुश्किल हो गया है. आइए जानते हैं कि झींगा किसान कौन-कौनसी परेशानियों से जूझ रहे हैं.
डॉ. मनोज का कहना है कि झींगा फीड, बीज (झींगा का बीज), लेबर और डीजल की कीमतें 15 से 30 फीसद तक बढ़ गई हैं. इतना ही नहीं एरेशन और प्रोसेसिंग भी महंगी हो गई है.
डॉ. मनोज के मुताबिक झींगा की समुद्री माल ढुलाई आज भी साल 2019 रेट के मुकाबले दो गुना ज्यादा हैं. उस पर परेशानी ये भी है कि अगर ढुलाई में देरी और पोर्ट की दिक्कतों से सप्लाई रिस्क और डिस्काउंट बढ़ जाते हैं.
डॉ. मनोज ने जानकारी दी है कि ग्राहक प्रोटीन के लिए झींगा को छोड़कर सस्ते प्रोडक्ट की ओर जा रहे हैं. इसी का नतीजा है कि यूएस और यूरोपियन यूनियन में झींगा का एक्सपोर्ट धीमा हो गया है. जिसके चलते झींगा की फार्मगेट की कीमतें ब्रेकइवन के करीब आ गई हैं.
डॉ. मनोज कहते हैं कि झींगा पर चौतरफा जो परेशानी आई हैं उसके चलते झींगा किसानों ने झींगा की स्टॉकिंग कम कर दी है. किसान कैश फ्लो की दिक्कत का सामना कर रहे हैं. वहीं बुरी खबर ये है कि झींगा के छोटे किसानों के बाहर निकलने का रिस्क बढ़ गया है.
डॉ. मनोज बताते हैं कि झींगा पालन और एक्सपोर्ट में राहत मिलना माल ढुलाई के नॉर्मल होने, फीड की लागत कम होने और ग्राहकों के दोबारा से वापस झींगा की ओर लौटने पर निर्भर करता है. इसे देखते हुए तब तक झींगा बाजार कम मार्जिन से ही चलेगा.
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