Goat-Poultry Farming: एक ही शेड में होगा दूध-मीट, अंडा, खूब हो रही इस मॉडल की चर्चा

Goat-Poultry Farming: एक ही शेड में होगा दूध-मीट, अंडा, खूब हो रही इस मॉडल की चर्चा

Goat-Poultry Farming एक ही फार्म में दूध-मीट और अंडा साथ मिले तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है. कुछ ऐसा ही मॉडल इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग सिस्टम (आईएफएस) तैयार किया गया है. इस सिस्टम के तहत बकरियों और मुर्गियों को एक साथ पाला जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि बहुत ही कम लागत पर मुर्गियों से अंडा मिलने लगता है. या फिर चिकन के लिए देसी मुर्गा कम लागत पर तैयार हो जाता है. 

नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Jun 25, 2026,
  • Updated Jun 25, 2026, 3:08 PM IST

अब एक ही शेड के नीचे दूध-मीट और अंडे का उत्पादन हो रहा है. उत्पादन के साथ ही इसकी चर्चा भी खूब हो रही है. एनिमल प्रोडक्ट एक्सपर्ट और साइंटिस्ट भी इसी मॉडल को अपनाने की सलाह दे रहे हैं. अगर मॉडल की बात करें तो ये इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग सिस्टम (आईएफएस) है. हालांकि ये सिस्टम नया नहीं है, लेकिन अब ज्यादातर लोग इसे अपना रहे हैं. इस मॉडल के तहत मुर्गियों और बकरियों को एक साथ पाला जाता है. केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मथुरा ने इस मॉडल को तैयार किया है. इस मॉडल का बड़ा फायदा ये है कि इसके तहत कम लागत पर अंडा और चिकन मिल जाता है. 

वहीं दूसरी ओर बकरी से दूध और बकरे का मीट तैयार हो जाता है. एक्सपर्ट की मानें तो मॉडल का एक बड़ा फायदा ये है कि बकरियों की मेंगनी (गोट मेन्योर) इस्तेमाल करने से हरा चारा पूरी तरह से ऑर्गनिक हो जाता है. और जब बकरियां ये हरा चारा खाती हैं तो दूध ऑर्गनिक मिलेगा और बकरे खाएंगे तो उनके मीट में चारे वाले पेस्टी साइट के इफेक्ट नहीं आएंगे.

ऐसे काम करता है इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग सिस्टम

सीआईआरजी गोट साइंटिस्ट की मानें तो आईएफएस सिस्ट्म के तहत एक ऐसा शेड तैयार किया जाता है जिसमे बकरी और मुर्गियां बराबर में साथ-साथ रहती हैं. दोनों के बीच फासले के तौर पर लोहे की एक जाली लगी होती है. जैसे ही बकरियां सुबह चरने के लिए चली जाती हैं तो जाली में लगा एक छोटी सा गेट खोल दिया जाता है. गेट खुलते ही मुर्गियां बकरियों की जगह पर आ जाती हैं. यहां जमीन पर या लोहे के बने स्टॉल में बकरियों का बचा हुआ चारा जिसे अब बकरियां नहीं खाएंगी पड़ा होता है. इसे मुर्गियां बड़े ही चाव से खाती हैं. 

इस हरे चारे में बरसीम, नीम, गूलर और उस तरह के आइटम भी हो सकते हैं जो बकरियों को कई तरह की बीमारी में फायदा पहुंचाते हैं. इस तरह से जो फिकने वाली चीज होती है उसे मुर्गियां खा लेती हैं. इस तरह से जो मुर्गी दिनभर में 110 ग्राम या फिर 130 ग्राम तक दाना खाती है तो इस सिस्टम के चलते 30 से 40 ग्राम तक दाने की लागत कम हो जाएगी. 

मुर्गियों के लिए मेंगनी से उगाएं अजोला

पानी में उगने वाले अजोला में बड़ी मात्रा में प्रोटीन होता है. और अजोला को उगाने के लिए न तो कोई बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और न ही बहुत ज्यादा लागत आती है. करना बस इतना है कि पानी का एक छोटा सा तालाब जैसा बना लें. इसका साइज मुर्गियों की संख्या पर भी निर्भर करता है. इसकी गहराई भी ना के बराबर ही होती है. इसमे थोड़ी सी मिट्टी डालने के साथ ही बकरियों की मेंगनी मिला दें. साइज के हिसाब से मिट्टी और मेंगनी का अनुपात भी अलग-अलग होगा. 

ऐसे रखी जाती हैं बकरियां-मुर्गियां 

आईएफएस के बारे में जानकारी देते हुए गोट साइंटिस्ट ने बताया कि इस सिस्टम के तहत आप एक बकरी पर पांच मुर्गी पाल सकते हैं. सीआईआरजी ने एक एकड़ के हिसाब से प्लान को तैयार किया है. इस प्लान के तहत आप बकरियों संग मुर्गी पालने के साथ ही बकरियों की मेंगनी से कम्पोस्ट भी बना सकते हैं. इस कम्पोपस्ट का इस्तेमाल आप बकरियों का चारा उगाने में कर सकते हैं. ऐसा करने से आपको एकदम ऑर्गनिक चारा मिलेगा. अजोला भी उगा सकते हैं.   

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