
ज्यादा दूध देने वालीं अच्छी नस्ल की गाय तैयार करना पहले एक बड़े सपने के जैसा होता था. विदेशों से अच्छी नस्ल की गाय लाई जाती थीं. विदेशी नस्ल की जर्सी और होल्स्टीन गाय इसका एक बड़ा उदाहरण है. लेकिन डेयरी एक्सपर्ट की मानें तो इस तरह दूसरे देशों से गाय या बुल लाना बहुत महंगा पड़ता था. साथ ही इसमे समय भी बहुत ज्यादा लगता था. वहीं दूसरे देश के गाय-बुल को भारतीय मौसम के मुताबिक ढलने में परेशानियों का सामना करना पड़ता था. लेकिन डॉ. अजय पाल सिंह असवाल, इंचार्ज IVF लैब, कालसी ब्रीडिंग फार्म, देहरादून (उत्तराखंड) की मानें तो अब गायों का दूध उत्पादन बढ़ाना और नस्ल सुधार करना बहुत आसान हो गया है.
हमारे फार्म पर ही पहली बार साल 2010 में भारत सरकार ने और उसके बाद नेशनल डेयरी प्लान के तहत नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड (NDDB) ने एम्ब्रियो उपलब्ध कराए थे. ULDB ने भी एम्ब्रियो आयात किए थे. भारत सरकार ने होल्स्टीन और जर्सी नस्ल के एम्ब्रियो (भ्रूण) आयात कराए थे. इन एम्ब्रिचयो से जो गाय मिलीं तो होल्स्टीन गायों ने एक स्टैंडर्ड लैक्टेशन में 11000 किलोग्राम से ज्यादा और जर्सी गायों ने 7000 किलोग्राम से ज़्यादा दूध दिया.
डॉ. अजय पाल के मुताबिक ULDB ने आयातित एम्ब्रियो से 47 फीसद बछड़ा कन्वर्ज़न रेट हासिल करके देश में टॉप पोजिशन हासिल की है. इंपोर्ट किए गए एम्ब्रियो से ULDB ने कुल 160 बछड़े पैदा कराए. इसमे 35 जर्सी और 47 होल्स्टीन के बछड़े डीप फ़्रोज़न सीमेन उत्पादन के लिए तैयार किए गए. कुल 70 बछड़े देश के अलग-अलग सीमेन स्टेशनों को दिए गए. इसे और उन्नत बनाने के लिए देशभर के प्रोफेशनल्स को इन विवो (in vivo) और इन विट्रो (in vitro) एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग दी जा रही है.
डॉ. अजय पाल ने बताया कि कालसी में एनिमल ब्रीडिंग फ़ार्म 1937 में शुरू किया गया था. 2005 तक यहां रेड सिंधी नस्ल की गायों की संख्या 100 से कम थी. ज़्यादातर जर्सी क्रॉस-ब्रीड और कुछ शुद्ध जर्सी नस्ल की गायें थीं. लेकिन एम्ब्रियो बायोटेक्नोलॉजी लैब बनने के बाद यहां कुछ सुधार आया. लैब बनते ही रेड सिंधी नस्ल में जेनेटिक सुधार और तेज़ी से संख्या बढ़ाने के लिए मल्टीपल ओव्यूलेशन और एम्ब्रियो ट्रांसफर का काम शुरू किया गया.
आज फ़ार्म में कुल 540 पशु हैं, जिसमे रेड सिंधी (353), साहीवाल (71), गिर (42), थारपारकर (34) और बद्री (6) नस्ल की गाय शामिल हैं. राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत इस फ़ार्म को देसी नस्लों के लिए 'सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस' के तौर पर विकसित किया जा रहा है। रेड सिंधी के साथ-साथ साहीवाल, गिर, थारपारकर और बद्री नस्लों को भी फ़ार्म में लाया गया.
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