
हिलसा (टेनुलोसा इलिशा) मछली का महत्व सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर ही नहीं है, बल्कि भारत की रसोइयों में भी हिलसा मछली एक खास जगह रखती है. देशभर में शायद ही कोई मछली खाने का ऐसा शौकीन होगा जो हिलसा को न कह सके. लेकिन एक वक्त ऐसा आया था कि एक हजार रुपये से लेकर 15 सौ रुपये किलो तक में भी बड़ी मुश्किल से हिलसा मछली खाने को मिलती थी. ऐसा लगता था कि नदियों से हिलसा मछली गायब हो गई है. जानकारों के मुताबिक हिलसा मछली भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और बर्मा समेत 11 देशों में पाई जाती है. भारत में यह महानदी, चिल्का, गोदावरी, रूपनारायण, हुगली और नर्मदा नदियों में पाई जाती है.
लेकिन दुनिया भर की सबसे ज्यादा 86 फीसद हिलसा मछली बांग्लादेश में पाई जाती है. हिलसा बांग्लादेश की राष्ट्रीय मछली है. लेकिन बहुत दिनों बाद अब हिलसा के बारे में एक अच्छी खबर आ रही है. गंगा नदी हिलसा खूब दिखाई दे रही है. केन्द्र सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में उत्तर प्रदेश के चंदौली से गुजरने वाली गंगा में हिलसा दिखाई दी है. चंदौली जिला वाराणसी से करीब 30 किमी दूर है.
केन्द्र की रिपोर्ट बताती है कि हिलसा मछली बंगाल की खाड़ी से गंगा नदी के रास्ते वाराणसी, प्रयागराज और उससे आगे तक आती-जाती थी. लेकिन जब 1975 में फरक्का बैराज बना तो हिलसा का आना-जाना कम हो गया. गंगा में इसकी कमी हो गई. जिसका असर मछली खाने और पकड़ने वालों पर पड़ा. लेकिन अब गंगा नदी के बीच और ऊपरी हिस्से में हिलसा मछली की वापसी हो चुकी है. इसे जलीय जैव-विविधता संरक्षण और आजीविका सुरक्षा की कोशिशों में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CIFRI), बैरकपुर और नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने हिलसा को दोबारा से नदियों में बसाने के लिए एक कार्यक्रम चलाया था. इसकी शुरुआत साल 2019 से हुई थी. ये एक साइंटीफिक प्रोग्राम था. इसके तहत 2019 और जून 2026 के बीच, ICAR-CIFRI ने एक मिली-जुली रणनीति लागू की. इसके तहत नदी में मछली छोड़ना (रैंचिंग), स्टॉक बढ़ाना, कृत्रिम प्रजनन, निषेचित अंडे और हैचरी में पैदा हुए बच्चे (स्पॉन) छोड़ना, टैगिंग, छोड़ने के बाद निगरानी और सभी संबंधित लोगों की भागीदारी शामिल थी.
इस दौरान 3.85 लाख से ज़्यादा छोटी और बड़ी हिलसा मछलियां नदी में छोड़ी गईं, जबकि 40 लाख से ज़्यादा निषेचित अंडे और लगभग 9.4 लाख हैचरी में पैदा हुए बच्चे (2-6 दिन पुराने) फरक्का बैराज के ऊपरी हिस्से में छोड़े गए. टैगिंग और निगरानी से इनके आने-जाने, जीवित रहने और गतिविधि के बारे में जानकारी मिलती रही.
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