
महाराष्ट्र के अकोला जिले के पातुर तालुका स्थित तांदली शिवार में एक दर्दनाक घटना सामने आई है. यहां जहरीली वनस्पति खाने से करीब 70 भेड़ों की मौत हो गई, जिससे बुलढाणा जिले के लाखनवाडा गांव निवासी भेडपालक महादेव शिंगाडे को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. इस घटना के बाद पशुपालक परिवार पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है. जानकारी के मुताबिक, महादेव शिंगाडे अपने करीब 150 भेड़ों के झुंड को चराने के लिए तांदली शिवार लेकर गए थे. इसी दौरान भेड़ों ने खेत में उगी किसी जहरीली वनस्पति के कोंब (नए अंकुर) खा लिए. कुछ ही समय बाद भेड़ों की हालत बिगड़ने लगी और देखते ही देखते एक-एक कर करीब 70 भेड़ों की मौत हो गई.
इस हादसे के बाद बचे हुए भेड़ों की हालत भी गंभीर बताई जा रही है, जिससे और नुकसान की आशंका जताई जा रही है. प्राथमिक जानकारी में यह सामने आया है कि निशिगंधा जैसी किसी जहरीली वनस्पति के सेवन से यह घटना हुई हो सकती है, हालांकि इसकी पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो पाएगी. घटना की जानकारी मिलते ही पशुवैद्यकीय विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और मृत भेड़ों का पोस्टमार्टम किया गया. फिलहाल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है.
एक भेड़ की कीमत लगभग 12 से 15 हजार रुपये बताई जा रही है. इस हिसाब से 70 भेड़ों की मौत से महादेव शिंगाडे को करीब 10 से 12 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है. इसके अलावा बाकी बची भेड़ों की हालत भी गंभीर बताई जा रही है, जिससे आगे और नुकसान की आशंका बनी हुई है. घटना के बाद सदमे में आए मेंढपाल महादेव शिंगाडे ने सरकार से आर्थिक सहायता और नुकसान भरपाई की मांग की है, उन्होंने बताया कि अचानक भेड़ों की तबीयत खराब हुई और कुछ ही समय में बड़ी संख्या में भेड़ों की मौत हो गई, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. पशु विभाग की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का पता चल सकेगा. फिलहाल पशुपालक परिवार सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठा है.
पशु विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार चरते समय भेड़ें अनजाने में ऐसे पौधे खा लेती हैं, जिनमें जहरीले तत्व मौजूद होते हैं. चारे की कमी या आसपास मौजूद हरी वनस्पतियों के कारण पशु इन पौधों की पत्तियां, कंद या अंकुर खा लेते हैं. इनमें मौजूद हानिकारक तत्व जैसे ग्लाइकोसाइड और अल्कलॉइड भेड़ों के पेट के खास हिस्से में पहुंचकर विष यानी का रूप ले सकते हैं. इस तरह की वनस्पति विषाक्तता को फूड पॉइजनिंग कहा जाता है. ऐसे में समय पर इलाज नहीं मिलने पर इसका असर तेजी से बढ़ सकता है और पशु की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है.