
ये सब को पता है कि हर साल गर्मियों के मौसम में दूध उत्पादन कम हो जाता है. इसकी एक बडी वजह तो मौसम है, लेकिन इसके साथ ही खानपान से जुड़ी कुछ छोटी-छोटी वजह भी हैं. जैसे हरे चारे की कमी होना. कमी के साथ हरा चारा महंगा भी हो जाता है. गौरतलब है कि अप्रैल से ही गर्मी अपना रूप दिखाने लगी है. उत्तर भारत में पारा 40 और 45 डिग्री को पार कर जाता है. और यही बढ़ती गर्मी पशुपालकों को परेशान कर देती है.
मई-जून की गर्मियों में हरे चारे की बहुत कमी हो जाती है. हर साल ही हरे चारे के लिए पशुपालकों को जूझना पड़ता है. लेकिन एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो बरसीम, जई और रिजका चारा गर्मियों में दूसरे हरे चारे के मुकाबले थोड़ा आसानी से मिल जाता है. क्योंकि बहुत सारे लोग मार्च में तीनों चारे की बुवाई कर देते हैं. और यही चारा मई-जून में बाजार में मिल जाता है.
फोडर साइंटिस्ट सलाह देते हुए बताते हैं कि किसान चारे की फसल के बीज बेचकर भी अपनी इनकम बढ़ा सकते हैं. अगर बरसीम, जई और रिजका की फसल से बीज उत्पादन किया जाए तो अच्छी इनकम होगी. वहीं उनका कहना है कि खासतौर पर गर्मियों में हरे चारे की बेहद कमी हो जाती है. इसलिए मई-जून में पशुओं के लिए हरे चारे की कोई कमी ना रहे इसके लिए मार्च में ही चारे की बुवाई शुरू कर दें.
खासतौर पर ज्वार, बाजरा, लोबिया और मक्का की बुवाई कर अच्छा पौष्टिक चारा लिया जा सकता है. मार्च में बुवाई करने से मई में फसल काटी जा सकती है. किसानों को खासतौर पर हरे चारे के बारे में ये सलाह कृषि विज्ञान केंद्र, सदलपुर और गांव ढाणा कलां में किसान गोष्ठी के मौके पर दी गई. इस मौके पर 100 से ज्यादा किसान मौजूद थे.
फोडर साइंटिस्ट का कहना है कि घर पर भी हरे चारे से हे और साइलेज बड़ी ही आसानी से बनाया जा सकता है. लेकिन जरूरत है बस थोड़ी सी जागरुकता की. जैसे पतले तने वाले चारे की फसल को पकने से पहले ही काट लें. उसके बाद तले के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें. उन्हें तब तक सुखाएं जब तक उनमे 15 से 18 फीसद तक नमी ना रह जाए. हे और साइलेज के लिए हमेशा पतले तने वाली फसल का चुनाव करें.
क्योंकि पतले तने वाली फसल जल्दी सूखेगी. कई बार ज्यादा लम्बे वक्त तक सुखाने के चलते भी चारे में फंगस की शिकायत आने लगती है. यानि चारे का तना टूटने लगे इसके बाद इन्हेंय अच्छी तरह से पैक करके इस तरह से रख दें कि चारे को बाहर की हवा न लगे.
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