
ग्लोबल वार्मिंग देश ही नहीं दुनिया की बड़ी परेशानी बन चुकी है. एनवायरमेंट एक्सपर्ट की मानें तो ग्लोबल वार्मिंग की सबसे बड़ी वजह है मीथेन गैस उत्सर्जन. मीथेन गैस उत्सर्जन के मामले में खेती और पशुपालन तीसरे नंबर पर आते हैं. हालांकि पहले नंबर पर एनर्जी प्रोडयूसर और दूसरे पर सड़क का ट्रैफिक है. लेकिन तीसरे नंबर के पशुपालन की बात करें तो इसमे डेयरी यानि की गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों को मुख्य वजय बताया गया है. हालांकि भेड़-बकरी के मुकाबले गाय-भैंस ज्यादा मीथेन उत्सर्जन करते हैं.
लेकिन परेशानी ये है कि एक तरफ तो गाय-भैंस की संख्या बढ़ाने की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर मीथेन की बड़ी वजह भी गाय-भैंस ही है. हालांकि पशुपालकों की इसी परेशानी को समझते हुए खासतौर पर गाय-भैंस के लिए चारा तैयार किया गया है. इस खास चारे को सीधे तो बड़ी मात्रा में नहीं खिलाया जाता है, लेकिन गाय-भैंस की जो मुख्य खुराक है उसमे इस खास चारे को शामिल कर लिया जाता है. इस चारे को खिलाने से पशुपालकों की इनकम भी डबल हो जाती है.
एक्सपर्ट का कहना है कि गाय-भैंस सबसे ज्यादा मुंह के रास्ते मीथेन गैस का उत्सर्जन करती हैं. वो जिस तरह का चारा खाती हैं उसे चबाने की पहली स्टेज के चलते ही मीथेन गैस ज्यादा बनती है. लेकिन रेड अल्गी से इसे कम किया जा सकता है. लेकिन रेड अल्गी को एक कट्टे फीड में कितना मिलाना है इसका भी बहुत ख्याल रखना पड़ता है. क्योंकि अगर फीड में रेड अल्गी ज्यादा हो गई तो फिर गाय-भैंस के दूध का उत्पादन कम हो जाएगा. जबकि हमे फीड भी ऐसा तैयार करना है जो दूध उत्पादन बढ़ाने वाला हो. भारत में हर साल करीब 21.4 मिलियन टन मीथेन का उत्पादन होता है.
रमानुज ने बताया कि जब पशुपालक रेड अल्गी वाला खास एनिमल फीड खरीदते हैं तो फीड के कट्टे में अंकों वाला एक कोड निकलता है. इस कोड को कंपनी के ऐप पर जाकर सबमिट करना होता है. इस अंकों वाले कोड से पता चल जाता है कि पशुपालक ने अपने पशुओं को कितना रेड अल्गी वाला फीड खिलाया जिससे मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने में मदद मिली. इसकी मदद से वाल्यूम में ये भी पता चल जाएगा कि पशुपालक ने कितनी गैस का उत्सर्जन होने से रोक लिया. उसी आधार पर पशुपालक को क्रेडिट नंबर मिल जाएंगे. इसके बाद पशुपालक इन नंबरों को बेचकर नकद मुनाफा भी कमा सकता है.
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