
बीते कुछ साल से मीट एक्सपोर्ट के आंकड़े में कमी देखी जा रही है. मीट एक्सपोर्टर की मानें तो इसकी बड़ी वजह मीट ट्रेसेबिलिटी सिस्टम है. मीट एक्सपोर्ट करने वाले बहुत सारे देश इस सिस्टम को अपना रहे हैं. ट्रेसेबिलिटी सिस्टम भारत में भी अपनाया जा रहा है, लेकिन अभी उस तरह से नहीं जैसे विश्व के दूसरे देशों में इसका पालन हो रहा है. हालांकि नेशनल मीट रिसर्च सेंटर, हैदराबाद एक ऐसा ही सिस्टम तैयार करने पर काम कर रहा है. मीट ट्रेसेबिलिटी का मतलब है मीट की पहचान करना. जैसे अगर ये भैंस का है तो कौनसी नस्ल की भैंस थी. किस राज्य और शहर की थी. किस फार्म पर पाली गई थी. बीमारियों से बचाने वाली कौन-कौनसी वैक्सीन लग चुकी हैं.
कभी फुट एंड माउथ डिजीज (FMD) और ब्रूसीलोसिस जैसी जानलेवा खतरनाक बीमारियां तो नहीं हुई हैं. कुछ इसी तरह की डिटेल मीट ट्रेसेबिलिटी में मिल जाती है. मीट एक्सपर्ट का कहना है कि कोरोना के बाद जूनोटिक बीमारियों से बचने के लिए बाजार में इस सिस्टम की बहुत मांग होने लगी है. यूरोपीय देशों ने साल 2000 में इसे सबसे पहले लागू किया था. फिर और दूसरे देशों ने भी अलग-अलग फार्मेट में मीट ट्रेसबिलिटी सिस्टम को अपने यहां लागू कर दिया है.
खासतौर से यूरोपियन यूनियन, जापान, उरुग्वे, ऑस्ट्रेलिया वगैरह ने एक सख्त पशुधन ट्रेसबिलिटी सिस्टम बनाया है, और इस सिस्टम को कानूनी सपोर्ट भी मिला हुआ है. इसलिए जो देश यहां मीट एक्सपोर्ट करेंगे तो उन्हें भी ट्रेसबिलिटी सिस्टम मानना होगा. इसका फायदा ये होगा कि बाजार में एक्सपोर्टर का भरोसा बढ़ेगा. खासतौर से भारत के लिए ये सिस्टम बाजार को बढ़ाने में मदद करेगा. साथ ही सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए ज़्यादा इनकम पैदा करेगा.
जो देश इन देशों को मांस एक्सपोर्ट करते हैं, उन्हें भी घरेलू नियमों के बराबर ट्रेसबिलिटी सिस्टम को फॉलो करना होगा। ट्रेसबैक की क्षमता से घरेलू और इंटरनेशनल दोनों बाजारों में कंज्यूमर्स का भरोसा बढ़ेगा। लंबे समय में, यह भारतीय मांस के लिए मार्केट एक्सेस बढ़ाकर एक्सपोर्ट की संभावनाओं का फायदा उठाने में मदद करेगा और सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए ज़्यादा इनकम पैदा करेगा.
एक्सपर्ट का कहना है कि ट्रेसेबिलिटी सिस्टम का एक बड़ा फायदा ये है कि इस सिस्टम ऐ एनिमल प्रोडक्ट की मार्केटिंग भी हो सकती है. जैसे ट्रेसेबिलिटी सिस्टम अपने डेटाबेस में उन किसानों की कॉन्टैक्ट डिटेल्स दे सकता है जो मीट के लिए अपने जानवर बेचना चाहते हैं. साथ ही उन बूचड़खानों के मैनेजरों के भी दिए जा सकते हैं जो जानवर खरीदना चाहते हैं. इस तरह की जानकारी बिचौलियों से बचाने में मदद करेगी और ई-मार्केटिंग के तरीकों को बढ़ाने में भी मदद कर सकती है.
पशुओं की डिजिटल पहचान यानि पशु आधार राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन (NDLM) मीट ही नहीं डेयरी प्रोडक्ट ट्रेसेबिलिटी सिस्टम को भी मजबूत करेगा. अभी इस पोर्टल पर करीब 36 करोड़ पशुओं को एक डिजिटल पहचान दी गई है. साथ ही इसकी मदद से किसानों को उनके पशु के टीकाकरण, चारे, वज़न बढ़ने और दवाईयों के विवरण को भी ट्रैक किया जा सकता है. और अगर उपभोक्ता की बात करें तो वो QR कोड या SMS की मदद से डिटेल उपलब्ध कराता है.
केन्द्रीय पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में 1.45 करोड़ तो साल 2025 में 1.51 करोड़ भैंसे मीट के लिए काटी गईं थी. अब ट्रेसेबिलिटी में होगा ये कि भैंस की उम्र, मीट के लिए मेल को काटा गया है या फीमेल को. नस्ल कौनसी थी. किस शहर के कौनसे रजिस्टर्ड फार्म पर उसे पाला गया था. क्या भैंस को सभी जरूरी टीके लगवाए गए थे. कब और कौनसी बड़ी बीमारियां काटे गए पशुओं को हुईं. उन्हें क्या दवाई दी गईं. फीमेल है तो कितने बच्चे दे चुकी है. जहां भैंस को पाला गया है वहां कोई संक्रमण तो नहीं फैला.
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