
बकरीद पर कुर्बानी के लिए पशुओं की खरीदारी शुरू हो चुकी है. हर शहर में बकरों की मंडियां लगी हुई है. देशभर में खासतौर पर बकरों की कुर्बानी दी जाती है. जम्मू-कश्मीर समेत दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में बकरों के मुकाबले भेड़ की कुर्बानी दी जाती है. धीरे-धीरे भेड़ की कुर्बानी करने वालों की संख्या बढ़ रही है. कुर्बानी के लिए खूबसूरत पशु के साथ उसका वजन भी देखा जाता है. अगर भेड़ के वजन की बात करें तो एक नस्ल ऐसी भी है जिसका वजन 100 किलो तक हो जाता है.
और ऐसे में अगर कुर्बानी करने वालों को 100 किलो की भेड़ मिल जाए तो फिर कहने ही क्या. देश में भेड़ों की 40 से भी ज्यादा नस्ल हैं. लेकिन एक खास नस्ल ऐसी भी जिसकी अभी भी बहुत डिमांड है. इस भेड़ से मिलने वाली ऊन किसी काम नहीं आती है, लेकिन इसका मीट देशभर में पसंद किया जाता है. इसे मुजफ्फरनगरी भेड़ के नाम से जाना जाता है. ये उत्तर प्रदेश की एक खास नस्ल है.
सीआईआरजी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. गोपाल दास का कहना है कि मुजफ्फरनगरी भेड़ को पसंद किए जाने की बड़ी वजह मीट में चिकनाई (वसा) का बड़ी मात्रा में होना है. जिसके चलते हमारे देश के ठंडे इलाके हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में मुजफ्फरनगरी भेड़ के मीट को बहुत पसंद किया जाता है. आंध्रा प्रदेश में क्योंकि बिरयानी का चलन काफी है तो चिकने मीट के लिए भी इसी भेड़ के मीट की डिमांड रहती है. एक्संपर्ट की मानें तो चिकने मीट की बिरयानी अच्छी बनती है.
डॉ. गोपाल दास ने बताया कि मुजफ्फरनगरी भेड़ खरीदने से पहले उसकी पहचान करना जरूरी है. कुछ खास तरीकों से पहचान करना आसान हो जाता है. जैसे देखने में इसका रंग एकदम सफेद होता है. पूंछ लम्बी होती है. घुटने से लम्बीं पूछ है तो मान लिजिए कि ये मुजफ्फरनगरी भेड़ है. 10 फीसद मामलों में तो इसकी पूंछ जमीन को छूती है. कान लम्बे होते हैं. नाक देखने में रोमन होती है. मुजफ्फरनगर के अलावा बिजनौर, मेरठ और उससे लगे इलाकों में भी पाई जाती है.
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