खरीफ फसलों की बुवाई 23% पिछड़ी"कम बारिश असर से देश में दिखने लगा है और इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है. इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत बेहद सुस्त और कमजोर रही है, जिसकी वजह से खरीफ की फसलों की बुवाई की रफ्तार बहुत धीमी पड़ गई है. कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 25 जून तक पूरे देश में कुल खरीफ बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 53.74 लाख हेक्टेयर कम दर्ज किया गया है. पिछले साल इस समय तक जहां 236.46 लाख हेक्टेयर खेत रंगे जा चुके थे, वहीं इस साल सिर्फ 182.72 लाख हेक्टेयर में ही बीज डाले जा सके हैं. यानी सीधे-सीधे कुल बुवाई में लगभग 22.7% की भारी गिरावट आई है, जिसने किसानों और सरकार दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. जून का महीना लगभग सूखा बीतने की वजह से देश के अधिकांश हिस्सों में खेतों में नमी गायब है, जिससे बुवाई का काम पूरी तरह अटक गया है.
खरीफ सीजन की सबसे मुख्य फसल धान यानी चावल की खेती पर इस सुस्ती का सबसे ज्यादा असर पड़ा है. आंकड़ों को देखें तो धान की बुवाई अब तक केवल 25.75 लाख हेक्टेयर में हो सकी है, जबकि पिछले साल इसी दौरान यह 34.41 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुकी थी. इस तरह धान के रकबे में 8.65 लाख हेक्टेयर यानी लगभग 25.1% की बड़ी कमी आई है. ठीक यही हाल हमारी थाली का मुख्य हिस्सा यानी दलहन (दालों) का भी है. दालों का कुल रकबा पिछले साल के 21.46 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार सिर्फ 14.92 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो कि सीधे-सीधे 30.5% की भारी गिरावट को दर्शाता है. खासतौर पर अरहर, उड़द और मूंग जैसी जरूरी दालों की बुवाई बहुत पिछड़ गई है.
इस मॉनसून की बेरुखी का सबसे दर्दनाक मंजर तिलहन की फसलों में देखने को मिल रहा है, जिनका रकबा आधे से भी कम रह गया है. पिछले साल जहां 36.41 लाख हेक्टेयर में तिलहन की बुवाई हो चुकी थी, वहीं इस साल यह सिमटकर महज 16.99 लाख हेक्टेयर रह गई है, यानी इसमें 53.3% की बहुत बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. तिलहन में भी सबसे बड़ा नुकसान सोयाबीन की फसल को हुआ है. सोयाबीन का रकबा 19.97 लाख हेक्टेयर से गिरकर सिर्फ 6.92 लाख हेक्टेयर पर आ गया है, यानी इसमें करीब 13.05 लाख हेक्टेयर यानी 65.3% की रिकॉर्ड तोड़ कमी आई है. इसके साथ ही मूंगफली की बुवाई भी पिछले साल के 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर केवल 8.87 लाख हेक्टेयर रह गई है, जो कि 42% की गिरावट है. तिलहन फसलों का इस तरह पिछड़ना देश के खाद्य तेल उत्पादन के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है.
नगदी फसलों की बात करें तो कपास की बुवाई को भी मॉनसून की मार झेलनी पड़ी है. इस साल कपास का रकबा पिछले साल के 45.36 लाख हेक्टेयर से घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर पर आ चुका है, जिसका मतलब है कि कपास की खेती में 15.70 लाख हेक्टेयर यानी करीब 34.6% का बड़ा घाटा हुआ है. इसके विपरीत गन्ने का रकबा पिछले साल के 56.64 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस बार 57.31 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो कि 0.67 लाख हेक्टेयर यानी लगभग 1.2% की बढ़त को दिखाता है.
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