32 साल का इंतजार खत्म: किशाऊ परियोजना पर 6 राज्यों की सहमति, दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक समझौता

32 साल का इंतजार खत्म: किशाऊ परियोजना पर 6 राज्यों की सहमति, दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक समझौता

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर दिल्ली में ऐतिहासिक समझौता हुआ है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने समझौते पर हस्ताक्षर किए. करीब 32 साल से लंबित इस परियोजना का रास्ता साफ हो गया है, जिससे जल प्रबंधन, सिंचाई और विभिन्न राज्यों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

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32 साल का इंतजार खत्म: किशाऊ परियोजना पर 6 राज्यों की सहमति, दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक समझौताकिशाऊ परियोजना पर 6 राज्यों की बनी सहमति

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर मंगलवार को दिल्ली में एक बड़ा और ऐतिहासिक समझौता हुआ. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के साथ लंबे समय से अटकी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है. समझौते के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी मौजूद रहे. केंद्र और संबंधित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी इस मौके पर उपस्थित थे. 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक समझौता बताते हुए कहा कि इसका लाभ किसी एक राज्य को नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली—सभी को अलग-अलग रूप में मिलेगा. उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छह राज्यों ने सहमति के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और ‘टीम इंडिया’ की भावना का बड़ा उदाहरण है.

32 साल पुराने प्रयास को मिली मंजिल

किशाऊ परियोजना का इतिहास करीब तीन दशक पुराना है. 12 मई 1994 को ऊपरी यमुना बेसिन से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर एक समझौता हुआ था. इसके तहत बेसिन में आने वाली प्रत्येक भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौते की व्यवस्था की गई थी. इसी व्यवस्था के तहत किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता तैयार हुआ. हालांकि तकनीकी, आर्थिक और राज्यों के बीच सहमति से जुड़े विभिन्न मुद्दों के कारण परियोजना लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी. 

लखवार और रेणुकाजी परियोजनाओं से जुड़े विवादों के समाधान के बाद किशाऊ परियोजना पर भी सहमति बनाने की प्रक्रिया तेज हुई. अमित शाह के मुताबिक, 2019 में लखवार और रेणुकाजी परियोजनाओं के विवाद सुलझने के बाद किशाऊ परियोजना के लिए परिस्थितियां अनुकूल हुईं. इसके बाद केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों के बीच लगातार बातचीत हुई. 16 जून को परियोजना को लेकर औपचारिक सहमति बनी और अब सभी राज्यों के हस्ताक्षर के साथ इसे निर्णायक रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है.

मोदी सरकार में दसवां बड़ा जल विवाद सुलझा

अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज देश का दसवां जल विवाद समाप्त होने जा रहा है. उन्होंने कहा कि 2018 से 2026 तक का दौर अंतरराज्यीय जल विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है. उन्होंने लखवार बहुउद्देशीय परियोजना और शाहपुर कंडी बांध परियोजना से लेकर रेणुकाजी बहुउद्देशीय बांध परियोजना, केन-बेतवा लिंक परियोजना, संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल रिवर लिंक योजना और अन्य जल परियोजनाओं का उल्लेख किया.

गृह मंत्री के मुताबिक, इन विवादों के समाधान में क्षेत्रीय परिषदों की बैठकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जल शक्ति मंत्रालय ने राज्यों के बीच संवाद को आगे बढ़ाया और जरूरत के अनुसार गृह मंत्रालय और अंतरराज्यीय तंत्र को भी इस प्रक्रिया में जोड़ा गया. अमित शाह ने कहा कि जल जैसे संवेदनशील विषय पर राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए सहमति बनाना आसान काम नहीं होता. लेकिन संवाद और आपसी सहयोग के जरिए लंबे समय से लंबित मुद्दों का समाधान संभव हुआ है.

90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार उठाएगी

किशाऊ परियोजना को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है. इसके तहत परियोजना की अनुमानित वित्तीय जिम्मेदारी का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि 1994 के समझौते के अनुसार संबंधित भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी. यह प्रावधान उन राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण है जिन पर परियोजना में वित्तीय भागीदारी का दबाव पड़ सकता था. अमित शाह ने विशेष रूप से उत्तराखंड की कठिनाइयों का जिक्र किया और कहा कि केंद्र सरकार राज्य की मांगों को अपनी योजनाओं के तहत समाहित करने का प्रयास करेगी. उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि आगे उत्तराखंड पर आने वाले वित्तीय भार को वहन करने में केंद्र सरकार उसकी मदद करेगी.

टोंस नदी पर बनेगा 232.6 मीटर ऊंचा बांध

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर विशाल कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा. इसकी ऊंचाई 232.6 मीटर होगी. परियोजना के तहत करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल का संग्रहण किया जाएगा. यह जल भंडारण उत्तर भारत के कई राज्यों की पानी से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

परियोजना से करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य है. इसके अलावा लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन भी होगा. इस तरह किशाऊ परियोजना सिर्फ जल भंडारण या सिंचाई परियोजना नहीं होगी, बल्कि सिंचाई, पेयजल, पर्यावरणीय प्रवाह और स्वच्छ ऊर्जा के लिहाज से बहुउद्देशीय परियोजना के तौर पर काम करेगी.

दिल्ली को सबसे बड़ा फायदा क्यों?

किशाऊ परियोजना से सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होने की बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह और दिल्ली की पानी की जरूरत से जुड़ी है. अमित शाह ने कहा कि यमुना के जल बंटवारे के समय एक महत्वपूर्ण कमी रह गई थी. उपलब्ध पानी का राज्यों के बीच बंटवारा तो किया गया, लेकिन नदी के पर्यावरणीय प्रवाह यानी नदी को जीवित रखने के लिए आवश्यक पानी की पर्याप्त गणना नहीं की गई.

नतीजा यह हुआ कि नदी के लिए पर्याप्त पानी छोड़े जाने की व्यवस्था नहीं बन सकी. दिल्ली में यमुना की स्थिति पर इसका सीधा असर देखने को मिला. किशाऊ परियोजना के जरिए आने वाले पानी में से 25 प्रतिशत पानी यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा. इससे यमुना में पर्याप्त पानी बनाए रखने और नदी के पुनर्जीवन के प्रयासों को मजबूती मिलने की उम्मीद है.

छह राज्यों के लिए अलग-अलग फायदे

किशाऊ परियोजना का प्रभाव छह राज्यों तक पहुंचेगा. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश परियोजना के प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े हैं. टोंस नदी पर बांध और जल संग्रहण की व्यवस्था इसी क्षेत्र में होगी. उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान को जल उपलब्धता और सिंचाई से संबंधित लाभ मिलने की उम्मीद है. इन राज्यों के कृषि क्षेत्रों में सिंचाई क्षमता बढ़ाने में परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. दिल्ली के लिए पेयजल और यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह का मुद्दा सबसे अहम है. इसीलिए राजधानी के संदर्भ में परियोजना को रणनीतिक महत्व का माना जा रहा है.(जितेंद्र बहादुर सिंह की रिपोर्ट)

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