
आलू के गिरते दाम का मामला बिहार तक पहुंच गया है. सबसे पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान सड़कों पर आए. किसानों का रोना है कि इस बार तीन-चार रुपये तक आलू के दाम पहुंच गए हैं. ऐसे में वे क्या लागत निकालेंगे और क्या मुनाफा कमाएंगे. मुनाफे की बात तो दूर, उत्तर प्रदेश और पंजाब के किसान खेत से मंडी तक ढुलाई का खर्च नहीं निकाल पा रहे हैं. इससे आजीज आकर किसानों ने खेत में आलू की खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चला दिया. यहां तक कि आलू के पौधे उखाड़कर भेड़-बकरियों को खिला दिया. अब किसानों का इसी तरह का विरोध प्रदर्शन बिहार में शुरू हो गया है.
मामला बिहार के बेगूसराय का है जहां आलू उत्पादक किसान इन दिनों आलू की ब्रिकी नहीं होने पर विरोध कर रहे हैं. यहां के किसान नेशनल हाइवे पर आलू फेंक कर अपना विरोध जता रहे हैं. दरअसल. इस बार आलू की पैदावार बहुत अधिक हुई, जिस वजह से दाम में बहुत अधिक गिरावट देखी जा रही है. किसानों को आलू की खेती में आई लागत भी नहीं मिल पा रही है. इन किसानों की शिकायत है कि उन्हें चार रुपये किलो में भी कोई खरीदार नहीं मिल रहा है और न ही कोल्ड स्टोरेज में रखने की जगह है.
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इसका विरोध करते हुए किसानों ने बेगूसराय के नेशनल हाइवे पर अपनी पूरी उपज फेंक दी. पूरा मामला बछवाड़ा प्रखंड क्षेत्र के रानी पंचायत का है जहां झमटिया ढ़ाला चौक के पास एनएच 28 पर दर्जनों किसानों ने आलू फेंक दिया. उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने से परेशान किसानों ने एनएच 28 पर ही आलू फेंक कर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के दौरान किसानों ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किसान नेता उमेश कुमार कर रहे थे.
बेगूसराय के अलग-अलग इलाकों से आए दर्जनों किसान ट्रैक्टर पर आलू लेकर आए और एनएच 28 को जाम कर दिया. फिर बारी-बारी से सभी किसानों ने सड़क पर ही आलू फेंक दिया. इस वजह से सड़क पर आवाजाही पूरी तरह से बंद हो गई. सड़क के दोनों किनारे वाहनों की लंबी लाइन लग गई. किसानों ने बताया कि आलू की खेती पर आए खर्च का आधा दाम भी नहीं मिल पा रहा है. अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले साल से किसान आलू की खेती छोड़ने को विवश होंगे.
बात केवल बिहार, यूपी या पंजाब की नहीं है. देश के कई हिस्सों में आलू इस बार किसानों की कमर तोड़ रहा है. कम रेट ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. किसान आलू की पक्की फसल की खुदाई तो कर रहे हैं, मगर उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि कम रेट से कैसे उबरा जाए.
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यही वजह है कि किसान खिन्न होकर ट्रैक्टर से आलू की उपज एनएच पर फेंक रहे हैं या खड़ी फसलों पर रोटावेटर चला रहे हैं. उनका कहना है कि कम से कम अगली फसल की तैयारी तो कर लें ताकि इस बार के घाटे की भरपाई हो सकेगी. इसी इंतजार में किसान लगातार खेती बढ़ा रहे हैं और उसका नतीजा है मांग से अधिक उत्पादन. फिर दाम में बड़ी गिरावट देखी जाती है. अब किसान सरकार से आलू को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाकर मूल्य निर्धारण करने की मांग कर रहे हैं.(सौरभ की रिपोर्ट)
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