पंजाब सरकारआम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार से राज्य के किसानों ने केंद्र की कृषि विपणन नीति को खारिज करने का आग्रह किया है. किसान यूनियनों ने कृषि विपणन (कृषि विपणन का मतलब है, कृषि उत्पादों को खेत से उपभोक्ता तक पहुंचाने की प्रक्रिया) पर राष्ट्रीय नीति ढांचे के मसौदे को खारिज करने और इसे पंजाब की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक बताया है. उन्होंने आरोप लगाया कि ये मसौदा ठंडे बस्ते में पड़े कृषि कानूनों के विवादास्पद प्रावधानों को फिर से पेश करने का एक प्रयास है, जिसके कारण 2020-21 में दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीने तक किसान आंदोलन चला था. 15 किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों और पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुदियां के बीच तीन घंटे की बैठक के दौरान किसानों ने इस नीति पर चिंता जताई है.
किसान यूनियनों ने तर्क दिया कि ये मसौदा खाद्य खरीद में निजीकरण को बढ़ावा देता है, जिससे संभावित रूप से कृषि के क्षेत्र में एकाधिकार प्रथाओं को बढ़ावा मिलता है. पंजाब में सबसे बड़े किसान संघ, भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्राहन) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उग्राहन ने नीति की आलोचना करते हुए इसे कहा “तीन कृषि कानूनों के विवादास्पद प्रावधानों को फिर से लागू करने का एक गुप्त प्रयास” है.
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बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ. दर्शन पाल, रुलदू सिंह मानसा और डॉ. सतनाम सिंह अजनाला समेत अन्य किसान नेताओं ने भी इसी तरह की चिंता जताई. राज्य सरकार से केंद्र को जवाब देने से पहले नीति की सावधानीपूर्वक जांच करने का आग्रह किया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब के किसानों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए.
कृषि मंत्री ने किसान यूनियनों को आश्वासन दिया कि पंजाब द्वारा केंद्र सरकार को अपना जवाब सौंपे जाने से पहले नीति पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी. उन्होंने कहा, "राज्य सरकार चिंतित है क्योंकि इस नीति के राज्य और उसके किसानों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं. हम केंद्र द्वारा साझा की गई मसौदा नीति के हर पहलू का विश्लेषण और परामर्श करना चाहते हैं."
कृषि मंत्री ने यह भी बताया कि मसौदे के किसी भी पहलू की अनदेखी न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कृषि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से परामर्श किया जाएगा. उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे अपने सुझाव और टिप्पणियां कृषि विभाग को भेजें.
पंजाब को शुरू में 10 दिसंबर तक नीति पर जवाब देना था, लेकिन उसने गहन समीक्षा करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा है. जनवरी 2024 के दूसरे सप्ताह में होने वाले पंजाब विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान नीति पर चर्चा होने की उम्मीद है.
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