कपास आयात के खिलाफ अभियान चलाएगा AIKS (सांकेतिक तस्वीर)कच्चे कपास के आयात को लेकर केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ देश के कपास उत्पादन वाले गांवों में विरोध की आहट तेज हो गई है. अखिल भारतीय किसान सभा ने कहा है कि अमेरिका से कच्चे कपास आयात की अनुमति किसानों के साथ खुला विश्वासघात है. इसलिए वह कपास बेल्ट के गांवों में व्यापक जन आंदोलन और अभियान चलाया जाएगा. संगठन ने सरकार की इस नीति को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग दोहराई.
AIKS ने शनिवार को एक प्रेस बयान में कहा कि कच्चे कपास के आयात से घरेलू बाजार में कीमतों पर और दबाव पड़ेगा, जिससे पहले से संकट में फंसे कपास किसानों की हालत और खराब होगी. संगठन ने कहा कि मंत्री पीयूष गोयल का यह बयान कि अमेरिका से कच्चा कपास खरीदने पर भारत के तैयार वस्त्र उत्पादों को शून्य प्रतिशत शुल्क पर निर्यात की सुविधा मिलेगी, किसानों के हितों के खिलाफ है. AIKS ने चेतावनी दी है कि इस फैसले से कपास उत्पादक क्षेत्रों में कर्ज, आर्थिक तनाव और सामाजिक संकट और गहराएगा.
किसान संगठन ने आरोप लगाया कि यह नीति सरकार के उन दावों को पूरी तरह झूठा साबित करती है, जिनमें कहा जा रहा था कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से कृषि को बाहर रखा गया है और प्रधानमंत्री किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे. संगठन ने कहा कि बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा किए गए मुक्त व्यापार समझौते दरअसल अमेरिकी हितों के सामने समर्पण का उदाहरण बनते जा रहे हैं, जिनका सीधा खामियाजा भारतीय किसानों को भुगतना पड़ रहा है.
AIKS ने कहा कि अमेरिकी कपास किसान अत्यधिक मशीनीकरण, भारी सब्सिडी और राज्य समर्थन के सहारे उत्पादन करते हैं, जबकि भारतीय कपास किसान बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद और कीटनाशकों के बोझ से दबे हैं. इसके बावजूद उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य A2+FL तक भी नहीं मिल पा रहा है.
संगठन ने कहा कि सरकार घरेलू उद्योगपतियों को सस्ता आयातित कपास उपलब्ध कराने के लिए भारतीय किसानों को वैश्विक बाजार की असमान प्रतिस्पर्धा में झोंक रही है, जहां उनके लिए टिके रहना लगभग असंभव है.
सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि अमेरिका से होने वाला कपास निर्यात सीमित है और आयात शुल्क हटाने से घरेलू बाजार पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा. AIKS ने इस दलील को भ्रामक बताया. संगठन ने कहा कि आयात की थोड़ी सी बढ़ोतरी भी घरेलू कीमतों को गिराने के लिए काफी होती है. AIKS ने याद दिलाया कि इसी तरह के तर्कों के बाद आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौते के चलते केरल के रबर किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था.
आंकड़ों के हवाले से संगठन ने कहा कि 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 29.22 मिलियन गांठ होने का अनुमान है, जबकि अमेरिका का 2024-25 का उत्पादन 14.41 मिलियन गांठ रहा, जो भारत के उत्पादन का लगभग आधा है. इसके बावजूद भारत सरकार ने 30 सितंबर 2025 से 31 दिसंबर 2025 तक कपास पर आयात शुल्क शून्य कर दिया. इस अवधि में अमेरिका से भारत को होने वाले कपास निर्यात में 95 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो घरेलू बाजार पर बढ़ते दबाव का साफ संकेत है.
AIKS ने चेतावनी दी है कि अगर भारतीय कपास किसानों को बिना किसी प्रभावी बाजार संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के हवाले कर दिया गया तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देशों के सब्सिडी प्राप्त और तकनीकी रूप से उन्नत किसानों से मुकाबला करना उनके लिए संभव नहीं होगा. इसका नतीजा खेती से पलायन, बढ़ती बेरोजगारी और कृषि संकट के और गहराने के रूप में सामने आ सकता है.
संगठन ने यह भी जिक्र किया कि देश में आत्महत्या करने वाले किसानों में कपास उत्पादक क्षेत्रों का अनुपात पहले से ही अधिक रहा है. महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कपास बेल्ट लंबे समय से संकटग्रस्त हैं. AIKS ने कहा कि आयात नीति में यह बदलाव इन क्षेत्रों में हालात को और विस्फोटक बना सकता है.
वस्त्र उद्योग के आंकड़ों का हवाला देते हुए AIKS ने कहा कि 2024-25 में भारतीय वस्त्र उद्योग का कुल मूल्य लगभग 179 अरब डॉलर रहा, जिसमें से करीब 80 प्रतिशत उत्पादन घरेलू बाजार में ही खपत हुआ. कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा केवल 6.2 प्रतिशत है. संगठन ने सवाल उठाया कि इतने सीमित निर्यात लाभ के लिए देश के करोड़ों कपास किसानों के भविष्य को दांव पर क्यों लगाया जा रहा है?
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