Cotton Price: घाटे पर चुप्पी, मुनाफे पर मिर्ची...जीरो ड्यूटी से किसान को लूटने पर क्यों तुली है इंडस्ट्री?

Cotton Price: घाटे पर चुप्पी, मुनाफे पर मिर्ची...जीरो ड्यूटी से किसान को लूटने पर क्यों तुली है इंडस्ट्री?

जब किसान घाटे में था तब उद्योग जगत खामोश रहा, लेकिन जैसे ही किसान की मेहनत की वाजिब कीमत मिलने का समय आया, ड्यूटी फ्री आयात की लॉबिंग शुरू हो गई. असल में, आज जो विदेशी कपास हमें सस्ता लग रहा, वो दरअसल हमारे भविष्य की गुलामी का निवेश है. जब हमारे खेत सूने पड़ जाएंगे और मिलों के पहिए विदेशी सप्लायर्स के रहमोकरम पर घूमेंगे, तब हमें अहसास होगा कि हमने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए अपनी 'रीढ़ की हड्डी' ही तोड़ दी है.

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Cotton Price: घाटे पर चुप्पी, मुनाफे पर मिर्ची...जीरो ड्यूटी से किसान को लूटने पर क्यों तुली है इंडस्ट्री?जीरो ड्यूटी वाली आत्मघाती मांग क्यों?

खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब कपास किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से चंद रुपये ऊपर मिलने की उम्मीद जगी, तो टेक्सटाइल लॉबी ने अपने मुनाफे की ढाल आगे कर दी है. एक तरफ गुलाबी सुंडी और बढ़ती लागत से लहूलुहान किसान है, तो दूसरी तरफ सरकार पर 'जीरो ड्यूटी' का दबाव बनाती बड़ी मिलें. अक्सर देखा गया है कि जब भी इंडस्ट्री कोई मांग करती है, तो नीतिगत फैसले उनकी झोली में जा गिरते हैं, लेकिन जब किसान MSP के लिए सिसकता है, तो बाजार की ताकतें खामोश हो जाती हैं. सवाल बड़ा है-क्या सरकार इंडस्ट्री के कहने पर परोक्ष रूप से विदेशी किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने देश के कॉटन क‍िसानों के ह‍ितों की बलि देगी?

सरकार ने अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच जब कॉटन से 11% आयात शुल्क हटाया था तो आयात में 'उछाल' आया और उसने घरेलू किसानों की कमर तोड़ दी. अब इतिहास खुद को दोहराने की तैयारी में है. इंडस्ट्री फिर से मई से अक्टूबर के बीच वही 11% ड्यूटी हटाने की मांग कर रही है. अगर ऐसा हुआ, तो विदेशी कपास एक बार फिर भारतीय किसान के 'नसीब' पर डाका डालेगी.  

टेक्सटाइल इंडस्ट्री की कैसी सोच? 

एगमार्कनेट के आंकड़े गवाह हैं कि कॉटन किसानों ने पिछले कई महीने 'अंधेरे' में काटे हैं. दिसंबर 2025 में कपास का दाम 7,377 प्रति क्विंटल था. यानी सरकार द्वारा तय 7,710 की MSP से भी 333 रुपये कम. मार्च 2026 में भी यह 7,558 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल तक ही पहुंच पाया. इन महीनों में जब किसानों को एमएसपी भी नहीं म‍िल रहा था तब टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने चुप्पी साध रखी थी. अब, अप्रैल 2026 में जब दाम MSP से मामूली ऊपर चढ़कर 7,866 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल हुए हैं, तो अचानक उद्योग जगत में 'महंगाई' का हाहाकार मच गया है. सवाल यह है कि क्या किसान को एमएसपी से सिर्फ 156 ज्यादा मिलना इतना बड़ा गुनाह है कि इसके लिए देश की आयात नीतियों को ही बदलने की मांग शुरू कर दी जाए? जब किसान के दो पैसे बढ़े, तो इंडस्ट्री को दर्द क्यों होने लगा है?

किसानों की टूटती कमर

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 2024-25 के सीजन में भारत ने रिकॉर्ड 41 लाख गांठ कपास आयात किया. अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया का कपास हमारे बाजार में भर गया. कॉटन के नए सीजन 2025-26 के लिए आयात और भी बढ़ने का अनुमान है. यह इस साल 50 लाख गांठ तक पहुंच सकता है. कपास सीजन अक्टूबर से सितंबर तक चलता है. अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, चालू सीजन में भी आयात की गति पिछले साल के मुकाबले तेज बनी हुई है. यह भारतीय क‍िसानों को नुकसान पहुंचा रही है.

जीरो ड्यूटी की आत्मघाती मांग 

पिछले 5 सालों में कपास का रकबा 130 लाख हेक्टेयर से घटकर करीब 102 लाख हेक्टेयर पर आ गया है. उत्पादन भी 336 लाख गांठों से गिरकर 280 लाख गांठों तक सिमटने की कगार पर है. यानी किसान कपास छोड़ दूसरी फसलों की ओर जा रहा है. कपास के सिमटते रकबे और घटते उत्पादन के बीच 'जीरो ड्यूटी' आयात की मांग केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए भी एक आत्मघाती कदम साब‍ित हो सकता है. 

कुल म‍िलाकर बात यह है क‍ि अगर सरकार इंडस्ट्री के दबाव में आकर आयात के दरवाजे खोलती है, तो घरेलू किसान कपास की खेती से पूरी तरह तौबा कर लेगा. इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब भारत का अपना उत्पादन खत्म हो जाएगा, तब आज सस्ता कॉटन भेजने वाले देश (अमेरिका, ब्राजील आदि) भारतीय बाजार पर एकाधिकार जमा लेंगे और भविष्य में ब्लैकमेल कर मनमाना दाम वसूलेंगे. उस वक्त न तो देश के पास अपना 'सफेद सोना' होगा और न ही टेक्सटाइल इंडस्ट्री के पास मोलभाव करने की ताकत, जिससे पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और औद्योगिक ढांचा विदेशी ताकतों के रहमोकरम पर निर्भर हो जाएगा. 

विदेशी कपास को 'रेड कारपेट' क्यों? 

ड्यूटी कम करके कीमतों को कृत्रिम रूप से गिराने का यह खेल महज बाजार के आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि उस अटूट भरोसे का कत्ल है जो एक किसान अपनी मिट्टी और अपनी सरकार पर करता है. टेक्सटाइल इंडस्ट्री का 'महंगाई का रोना' दरअसल अपने विशाल मुनाफे को सुरक्षित रखने की एक सोची-समझी कवायद भर है. 

विडंबना देखिए, जब किसान घाटे में था तब उद्योग जगत खामोश रहा, लेकिन जैसे ही किसान की मेहनत की वाजिब कीमत मिलने का समय आया, ड्यूटी फ्री आयात की लॉबिंग शुरू हो गई. सवाल यह है क‍ि एक तरफ जब सरकार 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा दे रही है तो दूसरी तरफ विदेशी कपास के लिए रेड कारपेट क्यों बिछा रही है? क्या हमारा 'मेक इन इंडिया' भारतीय क‍िसानों के ह‍ितों को कुचलकर विदेशी कच्चे माल की बैसाखियों पर टिका रहेगा?

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