बेकार नहीं, वरदान है पुरानी ऑयल पाम पौध! किसानों और कंपनियों को होगा बड़ा फायदा

बेकार नहीं, वरदान है पुरानी ऑयल पाम पौध! किसानों और कंपनियों को होगा बड़ा फायदा

भारत को खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑयल पाम की खेती का विस्तार किया जा रहा है. नर्सरी में बची पुरानी और बड़ी हो चुकी ऑयल पाम पौध को वैज्ञानिक तकनीक से पुनर्जीवित कर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है. इससे किसानों को लाभ मिलेगा, उत्पादन बढ़ेगा और खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.

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बेकार नहीं, वरदान है पुरानी ऑयल पाम पौध! किसानों और कंपनियों को होगा बड़ा फायदापाम पौध बनेगी कमाई का जरि

भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ता देशों में से एक है. देश में खाने के तेल की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन अभी भी जरूरत के मुकाबले कम है. इसी कारण भारत को हर साल बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी खर्च होता है. इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम (NMEO-OP) शुरू किया है. इसका उद्देश्य देश में ऑयल पाम की खेती बढ़ाकर खाद्य तेल उत्पादन को बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है.

नर्सरी में जमा हो रही हैं अतिरिक्त पौध

ऑयल पाम की खेती के लिए पौध तैयार करने में काफी समय लगता है. आमतौर पर पौध को नर्सरी में 12 से 14 महीने तक रखा जाता है और उसके बाद खेतों में लगाया जाता है. लेकिन कई बार खेती का विस्तार योजना के अनुसार नहीं हो पाता. ऐसे में नर्सरी में बड़ी संख्या में पौधे बच जाते हैं.

समय के साथ ये पौधे 3 से 4 साल पुराने हो जाते हैं और उनकी ऊंचाई 12 से 14 फीट तक पहुंच जाती है. इतनी बड़ी पौध को किसान खेत में लगाने से बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अच्छी तरह विकसित नहीं होगी. परिणामस्वरूप नर्सरी में बड़ी संख्या में पौधे बेकार होने की स्थिति में पहुंच जाते हैं.

वैज्ञानिक तरीका बना समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि इन अतिरिक्त और बड़े हो चुके पौधों को पूरी तरह बेकार मानना सही नहीं है. वैज्ञानिक तरीके से इन पौधों को फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है. इसके लिए पौधों की पत्तियों की छंटाई और कटाई की जाती है, जिससे पौधे पर अतिरिक्त दबाव कम होता है.

इसके बाद पौधों को पर्याप्त सिंचाई, संतुलित पोषण और नियमित निगरानी दी जाती है. इस पूरी प्रक्रिया को "पौध पुनर्जीवन" या रीजुवेनेशन कहा जाता है. इससे पौधे दोबारा स्वस्थ होकर नई हरी पत्तियां निकालने लगते हैं और कुछ समय बाद फिर से खेत में लगाने योग्य बन जाते हैं.

किसानों और कंपनियों को होगा फायदा

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पहले से तैयार पौधों का उपयोग किया जा सकता है. नई पौध तैयार करने में काफी समय और खर्च लगता है, जबकि पुनर्जीवित पौधे कम समय में खेती के लिए तैयार हो जाते हैं.

इससे कंपनियों को नई नर्सरी तैयार करने की जरूरत कम पड़ती है और किसानों को भी जल्दी पौध उपलब्ध हो जाती है. खासकर वे कंपनियां जो पहली बार ऑयल पाम खेती के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं, उन्हें इस तकनीक से 18 से 20 महीने तक का समय बच सकता है.

तेजी से बढ़ेगा ऑयल पाम उत्पादन

जब खेतों में पौध जल्दी लगेगी तो उत्पादन भी जल्दी शुरू होगा. इससे देश में पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ेगा और खाद्य तेल की मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी. वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. यदि ऑयल पाम की खेती तेजी से बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है.

इससे किसानों की आय बढ़ेगी, कृषि क्षेत्र को मजबूती मिलेगी और देश की विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी. यही कारण है कि विशेषज्ञ इस तकनीक को खाद्य तेल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं.

टिकाऊ कृषि की दिशा में नया अवसर

ऑयल पाम की अतिरिक्त पौध को वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित करना केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के बेहतर उपयोग का भी उदाहरण है. जिन पौधों को पहले नुकसान माना जा रहा था, वे अब उत्पादन बढ़ाने का मजबूत साधन बन सकते हैं. यह तरीका किसानों, कंपनियों और देश तीनों के लिए लाभदायक साबित हो सकता है. इससे समय, पैसा और संसाधनों की बचत होगी तथा ऑयल पाम मिशन को गति मिलेगी.

भारत को खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑयल पाम की खेती का विस्तार जरूरी है. नर्सरी में मौजूद अतिरिक्त और बड़े हो चुके पौधों को वैज्ञानिक तकनीक से पुनर्जीवित करके उपयोग में लाया जा सकता है. यह न केवल खेती की लागत और समय को कम करेगा, बल्कि देश में खाद्य तेल उत्पादन बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. सही योजना और वैज्ञानिक सोच के साथ यह पहल भारत के खाद्य तेल मिशन को नई दिशा दे सकती है.

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