कन्नौज के आलू बेल्ट में गिरे आलू के भावउत्तर प्रदेश के आलू किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. कानपुर, कन्नौज से लेकर मैनपुरी तक लाखों किसान अपनी मेहनत की फसल का उचित दाम न मिलने से आर्थिक संकट में हैं. किसानों का सवाल यह है कि आखिर उनकी पुकार सरकार तक कब पहुंचेगी? इस मामले को लेकर विपक्षी पार्टियां भी तल्ख तेवर अपना रही हैं और सरकार से सवाल-जवाब कर रही हैं. समाजवादी पार्टी ने आलू के गिरते दाम को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है.
उत्तर प्रदेश में कन्नौज का इलाका आलू की खेती के लिए जाना जाता है, मगर दाम नहीं मिलने से यहां के किसान परेशानी झेल रहे हैं. कभी आलू उत्पादन में देश की शान कहलाने वाला यह इलाका आज किसानों की बेबसी की कहानी बयां कर रहा है. कन्नौज जिले में लगभग 55 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती हुई. किसानों ने उम्मीद के साथ अपनी फसल को 197 कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रखा. लेकिन बाजार में कीमतें इतनी गिर गईं कि किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं.
सरकार की ओर से आलू किसानों की फसल को विदेशों में भेजने की बात कही जाती है जिसके लिए कार्यशाला का भी आयोजन जिला मुख्यालय पर उद्यान विभाग के द्वारा किया गया. इसमें आलू किसानों को खेती के तरीके, आलू की क्वालिटी और अन्य नियमों से अवगत कराया गया है.
कोल्ड स्टोरेज में 21 लाख 82 हजार 282 मीट्रिक टन से अधिक आलू रखा गया था, जिसमें से आज भी लगभग 16 लाख 98 हजार 252 मीट्रिक टन आलू भंडारित है. किसानों का कहना है कि मौजूदा दामों पर आलू निकालना घाटे का सौदा है. ऐसे में वे मजबूर होकर फसल को कोल्ड स्टोरेज में ही छोड़ देंगे.
इस संकट का असर केवल किसानों पर ही नहीं, बल्कि कोल्ड स्टोरेज संचालकों पर भी पड़ रहा है. यदि किसान आलू नहीं निकाल पाए, तो भंडारण शुल्क फंसने का खतरा भी बढ़ जाएगा. यह सिर्फ आलू की फसल का सवाल नहीं, बल्कि लाखों किसान परिवारों की आजीविका का सवाल है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सरकार किसानों की इस पुकार को सुनेगी, या फिर मेहनत की पूरी फसल घाटे में चली जाएगी.
आलू खेती पर नजर रखने वाले सरकारी उद्यान विभाग के अधिकारी आशीष कटियार का कहना है, जनपद के आलू उत्पादक किसान उनका वर्तमान में आलू सस्ता बिक रहा है, प्रोसेसिंग में क्या संभावना हो सकती है उत्पादन क्वालिटी में क्या कमी रह गई जिसको हम बाहर के देशों में नहीं भेज पाते. यूरोपियन देशों में आलू जाने के लिए किन चीजों की जरूरत है वह सब किसानों को बताया है. खड़ी देशों में चिप्स जाता था उससे काफी प्रभाव पड़ा है. नेपाल सरकार ने भंसार का 4 गुना सीमा शुल्क बढ़ाया है उससे भी प्रभाव पड़ रहा है.
गोरेलाल नाम के आलू किसान ने कहा, इस बार आलू की स्थिति खराब चल रही है. 500 कट्टी लागत आई जो 100 से 150 तक बिक रहा है. सफेद आलू का कोई मूल्य नहीं मिल रहा. यह मांग करते हैं कि सरकार आलू किसानों को राहत और मुआवजा दे. किसान मर जाएगा यदि इसका दाम नहीं मिलेगा.
आलू किसान ब्रजेश कटियार ने कहा, आलू की खुदाई से रेट गिरता चला गया, इंतजार करते करते आज आलू कोई नहीं ले रहा. 500-600 रुपये बिक्री की तैयारी की थी जबकि 150 रुपये पर आलू बिक रहा है. कोल्ड स्टोरेज वालों को अतिरिक्त भाड़ा देना पड़ेगा. सरकार को ध्यान देना चाहिए, हमको उचित मूल्य मिल जाए तो अच्छा रहेगा, सब सरकार के हाथ में है.
कोल्ड स्टोरेज मैनेजर हरिश्चंद्र मिश्रा ने कहा, किसान को आलू बेचना चाहिए. किसान को खबर करते हैं उसके बाद भी नहीं आता. आज स्थिति बहुत नाजुक दौर से गुजर रही है. आलू किसानों को दाम नहीं मिल पा रहा है. 30 अक्टूबर तक कुछ नहीं कर सकते तो उसके बाद कोल्ड स्टोरेज खाली करना पड़ेगा. आलू फेंकेंगे. गड्ढे खुदवाकर आलू भरना पड़ेगा.
कन्नौज के विधायक और समाज कल्याण राज्य मंत्री असीम अरुण ने बताया कि आलू बेल्ट से जुड़े किसानों की समस्या को देखते हुए कृषि मंत्री को लेटर भेजा गया है. आलू किसानों को संकटग्रस्त बिक्री से बचाने के लिए सपोर्ट प्राइस और न्यूनतम हस्तक्षेप मूल्य लागू करने की मांग हुई है. असीम अरुण ने पत्र में भामाशाह भाव स्थिरता कोष से सीधी खरीद, पीडीएस और राशन दुकानों से रियलिटी वितरण और भाड़ा सब्सिडी देने का सुझाव दिया है.
क्या किसान को ‘1 रुपये किलो’ आलू की क़ीमत देने से बनेगी ‘1 ट्रिलियन’ डॉलर की इकोनॉमी।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) August 11, 2026
ये है ‘डील की ढील’ का परिणाम
हैरान-परेशान है देश का किसान
वाह रे मुख्यमंत्री जी! pic.twitter.com/JWQOMpCkQZ
आलू किसानों से जुड़ी समस्याओं को लेकर अखिलेश यादव ने भी दाम पर सवाल खड़े किए हैं. कन्नौज से सांसद और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में सरकार पर हमला बोलते हुए लिखा, क्या किसान को 1 रुपये किलो आलू की कीमत देने से बनेगी 1 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी?(प्रभम श्रीवास्तव का इनपुट)
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