अलवर मंडी में बाजरे की बंपर आवकखरीफ सीजन की नई फसल के साथ अलवर की उपज मंडी में बाजरे की आवक शुरू हो चुकी है. बाजार में बाजरे के भाव 2300 रुपये से लेकर 2550-2600 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच रहे हैं. पिछले वर्षों की तुलना में उत्पादन और भाव बेहतर रहने से किसानों को राहत मिली है, लेकिन इसके बावजूद राजस्थान के किसानों को सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है. हरियाणा में किसान को बेहतर सुविधा, लाभ और फसल के भाव मिलते हैं. इसलिए राजस्थान के सीमावर्ती जिले अलवर, भरतपुर, सीकर, झुंझुनू, गंगानगर हनुमानगढ़ के किसान अपनी फसलों को बेचने के लिए हरियाणा जाते हैं.
भारतीय उद्योग व्यापार संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के कार्यकारी प्रांतीय अध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल जलालपुरिया ने बताया कि अलवर की उपज मंडी में इन दिनों नई फसल का बाजरा पहुंच रहा है. वर्तमान में प्रतिदिन करीब 10 से 12 हजार कट्टे बाजरे की आवक हो रही है. करीब 8 से 10 दिन पहले यह आंकड़ा बढ़कर 20 से 22 हजार कट्टे प्रतिदिन तक पहुंच गया था. आवक में कमी के बावजूद मंडी में कारोबार जारी है और बाजरे के भाव 2300 से 2550-2600 रुपये प्रति क्विंटल तक बने हुए हैं.
जलालपुरिया के मुताबिक, पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार किसानों को उत्पादन और बाजार भाव, दोनों के लिहाज से बेहतर स्थिति देखने को मिल रही है. बाजरे की कीमतों के बीच हरियाणा सरकार किसानों को 2900 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर के आधार पर लाभ देने की व्यवस्था है. यदि बाजार में बाजरा 2300 रुपये प्रति क्विंटल बिकता है, तो 600 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर किसानों को देने का प्रावधान है. इस व्यवस्था से किसानों को बाजार में कम भाव मिलने की स्थिति में आर्थिक राहत मिलती है और मंडियों में कारोबार भी जारी रहता है.
उन्होंने बताया कि भावांतर व्यवस्था में बाजार भाव और निर्धारित स्तर के बीच के अंतर के आधार पर किसानों को सहायता मिलने से उन्हें अपनी उपज बेचने में सहारा मिलता है. हालांकि, योजना की वास्तविक पात्रता, भुगतान की शर्तें और लागू दरें सरकारी नियमों के अनुसार निर्धारित होती हैं.
मंडियों में कारोबार के दौरान किसानों की समस्याएं और उनकी अपेक्षाएं सामने आती रहती है. व्यापार संघ इन मुद्दों को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास करता है. किसानों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब हरियाणा और राजस्थान, दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, तो राजस्थान के किसानों को भी बाजार भाव में गिरावट की स्थिति में ऐसी आर्थिक सुरक्षा क्यों नहीं मिलनी चाहिए.
राजस्थान के किसान चाहते हैं कि उन्हें भी ऐसी प्रभावी व्यवस्था का लाभ मिले, जिससे बाजार में उपज का भाव कम होने पर नुकसान की भरपाई हो सके. बेहतर बाजार भाव मिलने के बावजूद किसानों की चिंता यह है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ किस तरह मिले और खेती की लागत के मुकाबले उनकी आमदनी सुरक्षित कैसे रहे.
बाजरे की मांग और उपयोगिता पर चर्चा करते हुए जलालपुरिया ने बताया कि बाजरे का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा पशु आहार, पोल्ट्री फीड और अन्य फीड उद्योगों में इस्तेमाल होता है. अच्छी क्वालिटी वाले बाजरे की ग्रेडिंग कर उसे गुजरात सहित दूसरे राज्यों में भेजा जाता है. इस कारण बाजरे का कारोबार केवल स्थानीय खपत तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरे राज्यों की मांग का भी इस पर असर पड़ता है.
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मोटे अनाज यानी श्री अन्न को बढ़ावा दिए जाने से इनके प्रति जागरुकता और मांग बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं. बाजरा जैसे मोटे अनाज पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. यदि इनके उत्पादन, खरीद, प्रोसेसिंग और खपत को लगातार प्रोत्साहन मिले तो किसानों को नए बाजार मिल सकते हैं और गेहूं पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है.
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