भारत सरकार दिसंबर तक बढ़ा सकती है कपास पर ड्यूटी-फ्री आयात की छूटकपास के आयात की ड्यूटी फ्री सुविधा आगे भी जारी रह सकती है. सरकार और उद्योग जगत के तीन सूत्रों ने 'रॉयटर्स' से कहा, भारत दिसंबर तक दो और महीनों के लिए कपास के शुल्क-मुक्त आयात (ड्यूटी फ्री इंपोर्ट) को बढ़ाने की योजना बना रहा है. इस कदम से टेक्सटाइल मिलों की लागत कम हो सकती है, घरेलू कीमतों पर लगाम लग सकती है, और अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से आयात को बढ़ावा मिल सकता है.
चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश, भारत ने कम आपूर्ति वाले सीजन (lean season) में उपलब्धता बढ़ाने के लिए 1 जून से 31 अक्टूबर तक, यानी पांच महीनों के लिए कपास आयात पर लगने वाले 11% सीमा शुल्क (customs duty) को हटा दिया था.
आमतौर पर अक्टूबर में नए सीजन की फसल आने पर घरेलू कीमतें कम हो जाती हैं, लेकिन इस साल कम पैदावार की आशंका के चलते कीमतें ऊंची बनी हुई हैं. इसी वजह से मिलें ड्यूटी फ्री आयात की मियाद को और आगे बढ़ाने की मांग कर रही हैं.
मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि अलग-अलग मंत्रालयों के बीच बातचीत पूरी होने के बाद, सरकार जल्द ही एक आदेश जारी कर सकती है, जिसमें शुल्क छूट को कम से कम दिसंबर के अंत तक बढ़ाने की घोषणा की जा सकती है. हालांकि वित्त, वाणिज्य और कपड़ा मंत्रालयों ने इस बारे में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है.
जानकारों का कहना है कि अतिरिक्त आयात से वैश्विक कपास की कीमतों को सहारा मिल सकता है और घरेलू दरों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. मॉनसून की अनियमित बारिश के कारण फसल की पैदावार कम होने की आशंका है, जिससे घरेलू कीमतें बढ़ गई हैं.
घरेलू बाजार में कपास की कीमत 9,000 रुपये ($94.80) प्रति 100 किलोग्राम से ऊपर चल रही है, जो नए सीजन के लिए सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम मूल्य (floor price) 8,717 रुपये से अधिक है.
S&P ग्लोबल की प्रिंसिपल एनालिस्ट दीपांशी अग्रवाल ने कहा कि घरेलू उत्पादन में कमी, स्टॉक-टू-यूज अनुपात (stock-to-use ratio) का लगभग 31% तक गिरना — जो पिछले पांच वर्षों में सबसे निचला स्तर है — और टेक्सटाइल की मजबूत मांग, ये सभी कारक शुल्क छूट को बढ़ाने के पक्ष में संकेत देते हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इससे घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है.
व्यापारिक अनुमानों के अनुसार, 2026-27 में भारत में कपास का उत्पादन 290 लाख गांठों (bales) से नीचे रहने की संभावना है, जबकि मांग 340 लाख गांठों से अधिक है.
नई तकनीकों या उन्नत बीजों के अभाव में, किसान पुराने किस्म के आनुवंशिक रूप से संशोधित (genetically modified) कपास के बीजों का उपयोग कर रहे हैं. इससे फसल में कीड़े लगने का खतरा बढ़ जाता है और पैदावार भी कम मिलती है.
एक ग्लोबल ट्रेडिंग हाउस के डीलर ने कहा कि अमेरिकी कॉटन फ्यूचर्स का 83 सेंट प्रति पाउंड से ऊपर ट्रेड करना, माल ढुलाई (फ्रेट) की बढ़ती लागत और रुपये की कमजोरी, बड़े पैमाने पर आयात को सीमित कर सकती है - भले ही ड्यूटी-फ्री (शुल्क-मुक्त) सुविधा की अवधि बढ़ा दी जाए.
व्यापार मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों (अप्रैल से शुरू) में भारत का कॉटन आयात सालाना आधार पर 63% बढ़कर 1.1 अरब डॉलर हो गया है.
'कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री' की महासचिव चंद्रिमा चटर्जी ने कहा कि भारत को लंबे समय के लिए आयात शुल्क हटा देना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस शुल्क की वजह से निर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ गई है, और इसे हटाने से टेक्सटाइल इंडस्ट्री को वियतनाम और बांग्लादेश के साथ मुकाबला करने में मदद मिलेगी.
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