नाम बदलने से बढ़ गई किसानों की मुसीबतपूर्वांचल समेत देश के कई हिस्सों में कभी एक जानवर को लोग 'घड़रोज' के नाम से जानते थे. वक्त बदला और धीरे-धीरे लोग इसे 'नीलगाय' पुकारने लगे. बस यही नाम का बदलना किसानों के लिए एक बड़ी आफत बन गया. नाम में 'गाय' शब्द जुड़ जाने की वजह से आम लोग और समाज इसे गोवंश यानी गाय के समान समझने लगे. धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के कारण इस जानवर के खिलाफ कोई सख्त या कड़ा कदम उठाना मुमकिन नहीं हो पाता. नतीजा यह है कि आज बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में नीलगाय का खौफ और आतंक दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है. ये जानवर अकेले नहीं आते, बल्कि पूरी झुंड बनाकर रात के अंधेरे में खेतों पर धावा बोलते हैं, और चंद घंटों में खेत में लगी हरी-भरी फसलों को पूरी तरह खाकर और रौंदकर बर्बाद कर देते हैं. हर साल किसानों को इसकी वजह से हजारों-लाखों रुपये का भारी आर्थिक नुकसान बर्दाश्त करना पड़ता है.
यह सोचना बेहद जरूरी है कि आखिर अचानक नीलगायों की तादाद और उनका हौसला इतना कैसे बढ़ गया? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ सालों में जंगलों और झाड़ियों की कटाई बहुत तेजी से हुई है. जब वन्य जीवों के प्राकृतिक ठिकाने और घर ही उजाड़ दिए गए, तो वे भोजन की तलाश में बस्तियों और खेतों की तरफ रुख करने लगे. खेतों में उगने वाली मुलायम, हरी और पौष्टिक फसलें इन्हें आसानी से मिल जाती हैं, इसके अलावा, कुदरत का संतुलन भी बिगड़ चुका है. जंगलों में नीलगाय का शिकार करने वाले जंगली जानवरों जैसे , तेंदुए और भेड़ियों की संख्या बहुत कम हो गई है. जब कोई शिकारी ही नहीं बचा, तो नीलगायों की आबादी बिना किसी रोक-टोक के लगातार फैलती गई. आज आलम यह है कि यह जानवर सिर्फ एक जंगली जीव नहीं रह गया, बल्कि हमारे अन्नदाताओं के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट बन चुका है.
जब संकट बड़ा हो और सरकारी मदद मिलने में वक्त लगे, तो स्थानीय तजुर्बा और घरेलू नुस्खे ही काम आते हैं. नीलगाय को खेतों से दूर खदेड़ने का एक बेहद सस्ता, आसान और वैज्ञानिक तरीका है- आरपीसीएयू पूसा समस्तीपूर के पौध सुरक्षा विभाग के हेड डॉ एस.के. सिंह ने बताया कि सड़े हुए अंडे का घोल. यह पूरी तरह से एक प्राकृतिक और घरेलू उपाय है, जिसे किसान बिना किसी खास खर्च के अपने स्तर पर तैयार कर सकता है. बस आपके पास दो सड़े हुए अंडे, लगभग 15 लीटर साफ पानी, एक प्लास्टिक की बाल्टी या छोटा ड्रम और छिड़काव करने के लिए एक मग या स्प्रे मशीन होनी चाहिए. इस घोल को बनाने का तरीका बेहद सीधा और आसान है. सबसे पहले दो सड़े हुए अंडों को फोड़कर 15 लीटर पानी से भरी बाल्टी में अच्छी तरह से घोल कर लें. इसके बाद बाल्टी के मुंह को किसी ढक्कन या बोरी से अच्छी तरह ढक दें और इसे किसी छांव वाली जगह पर 5 से 10 दिनों के लिए छोड़ दें. इन दिनों के दौरान अंडे पानी के साथ मिलकर सड़ते हैं, जिससे उसमें से बेहद तीखी और बर्दाश्त न होने वाली बदबू आने लगती है.
जब यह बदबूदार घोल पूरी तरह तैयार हो जाए, तो इसे इस्तेमाल करने का तरीका भी जान लीजिए.डॉ एस.के. सिंह ने बताया कि इस घोल को कभी भी सीधे अपनी फसल या पौधों पर नहीं छिड़कना है. आपको इसे केवल अपने खेत की मेड़ों के चारों तरफ और खास तौर पर उस रास्ते या दिशा में जमीन पर छिड़कना है, जहां से नीलगायों के झुंड खेत के अंदर दाखिल होते हैं. अगर खेत ज्यादा बड़ा है, तो आप इस घोल को छोटे-छोटे बर्तनों या प्लास्टिक के डिब्बों में भरकर खेत के कोने-कोने में रख भी सकते हैं, ताकि इसकी महक हर तरफ बनी रहे. कुछ लोग सोच सकते हैं कि महज सड़े हुए अंडे के पानी से इतने बड़े और ताकतवर जानवर कैसे भाग सकते हैं? तो इसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक वजह है. नीलगाय पूरी तरह से एक शाकाहारी जानवर है और कुदरत ने इसके सूंघने की ताकत को बेहद तेज और संवेदनशील बनाया है. जब अंडा सड़ता है, तो उसमें से सल्फर के कंपाउंड और अमोनिया जैसी गैसें निकलती हैं. यह बदबू इतनी तीखी होती है कि नीलगाय इसे सह नहीं पाती और असहज महसूस करने लगती है. इस बदबू से सिर्फ नीलगाय ही नहीं, बल्कि फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले बंदर, जंगली सूअर और अन्य जानवर भी खेत से दूर रहते हैं
इस तरकीब का बाकायदा साइंटिफिक टेस्ट भी किया जा चुका है. 'डॉ एस.के. सिंह के अनुसार अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना फल के तहत केले की बागवानी करने वाले किसानों के खेतों पर इसका प्रयोग किया गया. अमूमन नीलगाय केले के पूरे गुच्छे को खाकर या तोड़कर बर्बाद कर देती है. इस परीक्षण में दोहरी तकनीक अपनाई गई. पहला, खेत की मेड़ों पर सड़े अंडे के घोल का छिड़काव किया गया और दूसरा, केले के गुच्छों को काली पॉलीथिन से ढक दिया गया. काली पन्नी की वजह से फल छिप गए और अंडों की बदबू ने जानवरों को दूर रखा. नतीजा यह हुआ कि केले की फसल पूरी तरह सुरक्षित बच गई.
विशेषज्ञ डॉ सिंह के अनुसार इस उपाय को पूरी तरह कामयाब बनाने के लिए कुछ जरूरी सावधानियों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है; जैसे अगर तेज बारिश हो जाए तो इस देसी दवा का असर धुल जाता है, इसलिए बारिश के फौरन बाद मेड़ों पर दोबारा छिड़काव जरूर करें और हर 15 दिनों के वक्फे (अंतराल) पर इस अमल को दोहराते रहें ताकि खेत से बदबू कम न होने पाए. खास बात यह है कि इस घोल को जितने ज्यादा दिनों तक ढककर रखा जाएगा, इसकी दुर्गंध उतनी ही तीखी होगी और नीलगायों पर इसका असर भी उतना ही तगड़ा होगा. अंततः यह नायाब तकनीक साबित करती है कि हर बड़े और खर्चीले संकट का हल हमेशा महंगी मशीनों या रसायनों में नहीं, बल्कि हमारे स्थानीय ज्ञान, समझदारी और वैज्ञानिक सोच में छुपा होता है.
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