इथेनॉल के दाम की 'गारंटी' तो मक्के पर क्यों नहीं, किसान बेहाल-फैक्ट्री मालामाल...आखिर ये कैसी नीति?

इथेनॉल के दाम की 'गारंटी' तो मक्के पर क्यों नहीं, किसान बेहाल-फैक्ट्री मालामाल...आखिर ये कैसी नीति?

Ethanol Price: जिन किसानों को मक्का बेचकर देश का 'ऊर्जादाता' बनने का हसीन ख्वाब दिखाया गया था, वे आज साल भर से अपने एमएसपी तक के लिए तरस रहे हैं. क्योंक‍ि, कंपनियों के 'इथेनॉल' को सरकारी सुरक्षा का कवच मिला है, पर किसान के 'मक्के' को सरेआम लूटने की खुली छूट है. जब इथेनॉल का दाम फिक्स है, तो मक्के का रेट रिस्क में क्यों है? यह कैसी नीति बनाई गई है कि उद्योगपतियों का मुनाफा पक्का रहे, भले ही देश के किसान का घाटा हो जाए.

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इथेनॉल के दाम की 'गारंटी' तो मक्के पर क्यों नहीं, किसान बेहाल-फैक्ट्री मालामाल...आखिर ये कैसी नीति?मक्के की कीमत के लिए तरसे भारत के किसान

पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंड‍िंग (E20) के टारगेट को पूरा करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाला मक्का उत्पादक किसान आज खुद को छला हुआ महसूस कर रहा है. इस बात के ल‍िए पीठ थपथपाई जा रही है कि हम ग्रीन फ्यूल बना रहे हैं. लेकिन इस पूरी 'इथेनॉल क्रांति' के पीछे की कड़वी सच्चाई को भी समझ लीज‍िए. इथेनॉल बनाने वालों को मुनाफे का सरकारी 'सुरक्षा कवच' हासिल है, जबक‍ि किसान की मेहनत को खुले बाजार की 'लूट' की छूट मिली हुई है. आज देश का किसान पूछ रहा है कि जब उद्योगपतियों के इथेनॉल का दाम बाजार के बजाय सरकार रेगुलेट करती है, तो किसानों के मक्के को बाजार की अनिश्चितताओं के हवाले क्यों छोड़ दिया गया है? जब इथेनॉल का 71.86 प्रति लीटर का दाम पक्का है, तो कड़ाके की धूप में खून-पसीना एक करने वाले किसान का मक्का उसके सरकारी दाम 2,400 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल पर क्यों नहीं ब‍िक रहा?

सरकार कागजों पर ढिंढोरा पीट रही है क‍ि मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2,400 प्रति क्विंटल है. लेकिन जब किसान अपनी ट्रॉलियां लेकर मंडी पहुंचता है, तो उसे व्यापारियों और आढ़तियों के रहमों-करम पर छोड़ दिया जाता है. मक्के की सरकारी खरीद न के बराबर है. इस साल 24 अप्रैल को मंडियों में मक्के का औसत भाव मात्र 1,766 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो एमएसपी से 26.42 फीसदी कम था. जनवरी में तो स्थिति और भी खराब थी, जब बाजार भाव महज 1663.41 प्रति क्विंटल रह गया था. खेल देखिए फैक्ट्रियां खुले बाजार से औने-पौने दाम पर मक्का उठा रही हैं. यानी कच्चे माल पर उन्होंने प्रति क्विंटल 600 से 700 की सीधी बचत कर ली, और उधर उनका माल यानी इथेनॉल भी तय रेट पर बिक रहा है. फैक्ट्री मालिकों को दोहरा मुनाफा हो रहा है और किसान कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है. 

उकसाकर मंझधार में छोड़ा

अप्रैल 2023 में फिक्की (FICCI) के एक कार्यक्रम में तत्कालीन कृषि सचिव मनोज आहूजा ने कहा था कि देश में इथेनॉल और पोल्ट्री उद्योग की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अगले 5 वर्षों में मक्के के उत्पादन में 10 मिलियन टन की वृद्धि करनी होगी. उत्पादन को तत्कालीन 34 मिलियन टन से बढ़ाकर 44-45 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया था. सरकार की इस अपील पर भरोसा करके देश के किसानों ने कड़ी मेहनत की. उन्होंने वर्ष 2024-25 में देश का कुल मक्का उत्पादन बढ़ाकर 43.4 मिलियन टन (434 लाख टन) तक पहुंचा दिया. लेकिन इस शानदार उपलब्धि के लिए किसानों को पुरस्कृत करने के बजाय, सरकार की गलत नीतियों ने उन्हें कम दाम का दर्द दे दिया. 

आत्मनिर्भरता के बाद भी आयात का घाव

भारतीय किसानों द्वारा रिकॉर्ड उत्पादन करने और मक्का के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के बावजूद, वर्ष 2024-25 के दौरान 10 लाख 70 हजार टन मक्के का आयात किया गया. इसके साथ ही, सरकार ने इथेनॉल बनाने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) से मिलने वाले चावल का कोटा भी बढ़ा दिया. चावल का विकल्प मिलने से इथेनॉल फैक्ट्रियों ने मक्के की खरीदारी कम कर दी, जिससे घरेलू बाजार में मक्के की मांग घटी और इसके दाम औंधे मुंह गिर गए. 

कौन देगा जवाब 

खेतों में खून-पसीना बहाने वाला आज पाई-पाई को बेहाल है, और उसकी सस्ती फसल से ईंधन बनाने वाली फैक्ट्री मालामाल है. इस तरह जिन किसानों को मक्का बेचकर देश का 'ऊर्जादाता' बनने का हसीन ख्वाब दिखाया गया था, वे आज साल भर से अपने एमएसपी तक के लिए तरस रहे हैं. आखिर वे नीति-निर्माता और पैरोकार अब किस कोने में मुंह छिपाए बैठे हैं, जो बड़े-बड़े मंचों से ढिंढोरा पीट रहे थे कि इथेनॉल उत्पादन से सीधे किसानों की किस्मत बदल रही है? कड़वी हकीकत तो यह है कि इथेनॉल के नाम पर मक्के की खेती करने वाले अन्नदाता को घाटे का जो गहरा जख्म मिला है, उसका दर्द वह जीवन भर नहीं भूल पाएगा.

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