
इथेनॉल बनाने में पानी की बेतहाशा बर्बादीइथेनॉल बनाने में पानी की बेतहाशा बर्बादी का तथ्य उजागर होने के बाद इसके लाभार्थी बेचैन हैं. एक लीटर इथेनॉल के पीछे 10,000 लीटर से अधिक पानी खर्च होने के आंकड़े से जिन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत है, उनमें से एक ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) है. उद्योग लॉबी का यह दावा कि "फैक्ट्रियों में इथेनॉल बनाने के लिए सिर्फ 3 से 5 लीटर पानी लगता है इसलिए 10,000 लीटर का आंकड़ा गलत है. दरअसल, यह सरासर आंखों में धूल झोंकने जैसा है. सच्चाई यह है कि उद्योगपति बड़ी चतुराई से केवल अपनी फैक्ट्री के अंदर के खर्च को गिनते हैं, लेकिन उस पानी को पूरी तरह गायब कर देते हैं जो अनाज को उगाने में लगा है. इसे पर्यावरण विज्ञान की भाषा में 'वॉटर फुटप्रिंट' (Water Footprint) कहा जाता है.
इथेनॉल को 'ग्रीन फ्यूल' कहकर बेचने वाले उद्योगपति करोड़ों की सब्सिडी और मुनाफे के चक्कर में देश के जल संसाधनों पर डाका डाल रहे हैं. वो एग्रीकल्चर वेस्ट से इथेनॉल बनाने की बजाय सीधे अनाज का इस्तेमाल कर रहे हैं. अब समय आ गया है कि सरकार इस 'वॉटर फुटप्रिंट' की समीक्षा करे, ताकि गाड़ियों में सस्ता पेट्रोल डालने के चक्कर में आने वाली पीढ़ियां पानी की एक-एक बूंद के लिए न तरसें. बहरहाल, इथेनॉल उद्योग के दावों की हवा निकालने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI, पूसा) और नीति आयोग के ही आधिकारिक आंकड़े काफी हैं.
चलिए, इस 10,000 लीटर वाले दावे के पीछे के विज्ञान और गणित को आसान भाषा में समझते हैं. मई 2024 में पूसा के तत्कालीन डायरेक्टर डॉ. अशोक कुमार सिंह ने धान की खेती में पानी के इस्तेमाल का एक सटीक आंकड़ा दिया था. उन्होंने बताया था कि '1 हेक्टेयर में धान उगाने के लिए पूरे सीजन में 150 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है.' इस 1 हेक्टेयर की जमीन से लगभग 3,000 किलो (3 टन) चावल पैदा होता है. इसका मतलब है कि 1 टन (1,000 किलो) चावल पैदा करने में 50 लाख लीटर पानी खर्च हुआ. यानी 1 किलो चावल उगाने में 5,000 लीटर पानी लगता है.

अब बात करते हैं कि इस चावल से इथेनॉल कितना बनता है. नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 1 टन सामान्य चावल से 450 लीटर और 1 टन टूटे चावल से 400 लीटर इथेनॉल बनता है. इसका मतलब है कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में लगभग 2.5 किलो टूटे चावल की जरूरत पड़ती है. इस तरह अगर चावल से इथेनॉल बनाया जाएगा तो निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से अधिक पानी खर्च होता है.
नीतियों का यह घोर विरोधाभास भारतीय कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना और अन्नदाता के साथ खुला अन्याय है. एक तरफ पंजाब और हरियाणा के किसानों पर भू-जल दोहन का सारा ठीकरा फोड़कर उन्हें 'मेरा पानी मेरी विरासत' जैसी योजनाओं के जरिए धान की खेती छोड़ने को कहा जा रहा है. दूसरी ओर पानी बचाने के नाम पर पूसा-44 जैसी उनकी अधिक उपज देने वाली पसंदीदा किस्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. वहीं दूसरी तरफ, उसी धान के टूटे चावल को इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की तिजोरियां भरने के लिए रिजर्व किया जा रहा है. पराली जलाने और पानी खर्च करने पर किसानों को कोसने वाले लोग कॉरपोरेट के इस मुनाफे पर मौन हैं, जहां 1 लीटर इथेनॉल निचोड़ने में 10,000 लीटर से अधिक पानी की बलि दे दी जाती है और उसे 'ग्रीन फ्यूल' का तमगा देकर पर्यावरण हितैषी भी बताया जाता है.
यह दोहरापन साफ दर्शाता है कि सरकारों के लिए पर्यावरण और भूजल की चिंता केवल किसानों पर पाबंदियां लगाने और उन्हें कटघरे में खड़ा करने तक ही सीमित है. जैसे ही बात ताकतवर उद्योग लॉबी की आती है, जल संरक्षण के सारे नियम और नीतियां फाइलों में दफन हो जाती हैं. यदि सत्ता के गलियारों में घटते जलस्तर को लेकर रत्ती भर भी गंभीरता है, तो इस नीतिगत पाखंड को तुरंत बंद करना होगा. या तो अपनी मिट्टी और मेहनत से देश का पेट भरने वाले किसानों को पानी बचाने का ज्ञान देना बंद कर उन्हें वैकल्पिक फसलों पर एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी दी जाए, या फिर अनाज से इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों के 'वॉटर फुटप्रिंट' का कड़ा ऑडिट कर उन पर भारी पर्यावरणीय जुर्माना लगाया जाए़ ताकि पर्यावरण की आड़ में चल रहा यह दोहरा खेल हमेशा के लिए खत्म हो सके.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today