
अब गेहूं के दाम के लिए तरसे किसानभारतीय कृषि बाजार में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है. पिछले 52 महीने से लगातार बढ़त पर रहने वाले गेहूं के दाम अब एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के नीचे फिसल गए हैं. यह स्थिति तब पैदा हुई है जब दुनिया भर में और भारत में गेहूं के उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़त का अनुमान लगाया जा रहा है. दुनिया भर में गेहूं का उत्पादन 842 मिलियन टन पहुंचने वाला है. भारत में भी रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान है. कहा जा रहा है कि बंपर पैदावार और बाजार में पहले से अधिक गेहूं मौजूद रहने की वजह से दाम एमएसपी से नीचे गिरे हैं. ऐसे में किसान पूछ रहा है कि अगर उसने दिन-रात एक करके देश का भंडार भर दिया, तो उसकी सजा उसे कम दाम के रूप में क्यों मिल रही है?
उत्पादन में उछाल खुशी की खबर होनी चाहिए थी, लेकिन लचर निर्यात नीति और भंडारण के कुप्रबंधन ने इसे 'किसानों का संकट' बना दिया है. क्या हमारा सिस्टम इतना लाचार है कि वह 'सरप्लस' को संभाल नहीं सकता? असल में यह एक ऐसा नीतिगत दुष्चक्र है जिसमें वर्षों से किसान पिस रहा है. जब किसान की फसल तैयार होने वाली होती है, ठीक उसी वक्त सरकार 'ओपन मार्केट सेल स्कीम' के जरिए सस्ता गेहूं बाजार में उतार देती है. इससे उन किसानों की जेब पर सीधा प्रहार होता है, जिसने अच्छे भाव की उम्मीद में खून-पसीना एक किया था.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो नवंबर 2021 में गेहूं का एमएसपी 1975 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि मंडियों में किसानों को 2000.76 रुपये का भाव मिल रहा था. यह सिलसिला जनवरी 2025 तक अपने चरम पर पहुंचा, जब एमएसपी 2275 रुपये था, लेकिन बाजार में गेहूं 2939.69 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रहा था. हालांकि, मार्च 2026 आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई. मार्च में गेहूं की एमएसपी 2425 रुपये थी, लेकिन मंडियों में भाव गिरकर 2367.25 रुपये प्रति क्विंटल रह गया था. वहीं, वर्तमान में गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि खुले बाजार में दाम 2441.88 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है.
भारत में गेहूं का उत्पादन 113.29 मिलियन टन से बढ़कर 117.95 मिलियन टन होने का अनुमान है. वैश्विक स्तर पर भी गेहूं का उत्पादन 800.81 से बढ़कर 842.17 मिलियन टन होने जा रहा है.
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि देश में गेहूं की मांग हर साल लगभग 1.42 मिलियन टन बढ़ रही है. 2021-22 में मांग 97.12 मिलियन टन थी, जो 2026-27 तक बढ़कर 104.22 मिलियन टन पहुंचने की उम्मीद है. यानी मांग बढ़ तो रही है, लेकिन उत्पादन की रफ़्तार उससे कहीं तेज है.
2026-27 में हमें 104.22 मिलियन टन गेहूं चाहिए, लेकिन हमारे पास होगा 117 मिलियन टन से ज्यादा. यह जो 'सरप्लस' गेहूं है, यही व्यापारियों के लिए दाम गिराने का हथियार बन गया है.
गेहूं के बफर स्टॉक में जरूरत से ज्यादा स्टॉक होना कीमतों में गिरावट और मंडियों में सुस्ती का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास वर्तमान में लगभग 222 लाख मीट्रिक टन गेहूं का स्टॉक है. 1 अप्रैल 2026 तक का अनुमानित स्टॉक 182 लाख टन है, जो कि निर्धारित बफर मानदंडों (74.6 लाख टन) से ढाई गुना से भी अधिक है.
व्यापारियों और निजी कंपनियों के पास भी पिछले साल की तुलना में काफी अधिक स्टॉक (लगभग 75-81 लाख मीट्रिक टन) मौजूद है. इसकी वजह से निजी खरीदार नई फसल खरीदने में सावधानी बरत रहे हैं, जिससे मंडियों में मांग कम है.
ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के तहत सरकार बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अपने बफर स्टॉक से गेहूं खुले बाजार में बेचती है. स्टॉक अधिक होने के कारण आपूर्ति बढ़ गई है, जिससे थोक और खुदरा कीमतों में नरमी आई है. कुल मिलाकर बाजार में "ओवरसप्लाई" की स्थिति पैदा हो गई है, जिससे दाम गिर रहे हैं.
सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर "कैरी फॉरवर्ड स्टॉक" (पुराना बचा हुआ स्टॉक) ज्यादा होने और नई फसल की बंपर आवक के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है. इसी वजह से कई मंडियों में दाम MSP के आसपास या उससे नीचे देखे जा रहे हैं.
सरकार का तर्क है कि दाम गिराने से आम आदमी को महंगाई से राहत मिलेगी. सरकारी दखल से खुले बाजार में गेहूं तो सस्ता हुआ, लेकिन आम आदमी तक इसका फायदा पहुंचते-पहुंचते काफी कम हो जाता है. अक्सर बिचौलिए और रिटेल चेन इस 'गिरावट' को अपनी जेब में रख लेते हैं और उपभोक्ता को नाममात्र की राहत मिलती है.
बहरहाल, सरकार एक तरफ 2585 रुपये प्रति क्विंटल का भारी-भरकम MSP देकर किसान को खुश करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ बाजार में स्टॉक छोड़कर दाम भी गिरा रही है ताकि शहरी मतदाता महंगाई से नाराज न हो. इस खींचतान में पिसता वही किसान है जिसकी मेहनत का फल 52 महीने बाद फिर से अनिश्चितता के भंवर में है.
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