साल के बीज से बदलेगी आदिवासियों की जिंदगी, कोरबा में प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की तैयारी

साल के बीज से बदलेगी आदिवासियों की जिंदगी, कोरबा में प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की तैयारी

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में साल बीज प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की तैयारी की जा रही है. इस पहल का मकसद वन उपज संग्रह करने वाले आदिवासी और वनाश्रित परिवारों की आय बढ़ाना है. यूनिट में साल बीज के साथ महुआ, नीम और कुसुम के बीजों से भी तेल निकाला जा सकेगा.

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साल के बीज से बदलेगी आदिवासियों की जिंदगी, कोरबा में प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की तैयारीसाल बीज की प्रोसेस‍िंग से आदिवास‍ियों को मिलेगा सहारा (AI Image)

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में जंगलों से मिलने वाली वन उपज को स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन से जोड़ने की दिशा में बड़ी पहल की तैयारी चल रही है. वन विभाग ने कटघोरा वन मंडल क्षेत्र में साल बीज प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया है. इस परियोजना का उद्देश्य वन उपज इकट्ठा करने वाले आदिवासी और वनाश्रित परिवारों की आय बढ़ाना है, ताकि उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर लाभ मिल सके. वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, साल बीज से निकाला जाने वाला तेल, जिसे आमतौर पर "साल बटर" कहा जाता है, खाद्य उद्योग में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है. चॉकलेट, बिस्किट और अन्य प्रोसेस्‍ड फूड प्रोडक्‍ट्स में इसका उपयोग वसा के विकल्प के रूप में किया जाता है. इसके अलावा कॉस्मेटिक, साबुन और सौंदर्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों में भी इसकी मांग बनी रहती है.

डोंगानाला गांव में प्रस्तावित है परियोजना

कटघोरा वन मंडल ने जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) योजना के तहत डोंगानाला गांव में यह यूनिट स्थापित करने का प्रस्ताव भेजा है. विभाग का कहना है कि अगर वन उपज की प्रोसेस‍िंग गांव या क्षेत्रीय स्तर पर ही हो तो उसका वास्तविक आर्थिक लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंच सकता है. इससे ग्रामीणों को कच्चा माल कम कीमत पर बेचने की मजबूरी भी कम होगी.

बिचौलियों की भूमिका घटाने की कोशिश

वर्तमान व्यवस्था में साल बीज, महुआ, चार, लाख और तेंदूपत्ता जैसी वन उपज ग्रामीणों से खरीदकर व्यापारी बड़े बाजारों और उद्योगों तक पहुंचाते हैं. प्रोसेसि‍ंग और मार्केटिंग से होने वाला बड़ा मुनाफा आमतौर पर इन्हीं के पास चला जाता है. प्रस्तावित यूनिट के जरिए वन विभाग इस स्थिति को बदलना चाहता है ताकि, संग्रहकर्ताओं को ज्‍यादा से ज्‍यादा लाभ मिल सके.

महुआ और अन्य बीजों की भी होगी प्राेसेसिंग

अधिकारियों के अनुसार कोरबा जिले के दोनों वन मंडलों में हर वर्ष मई और जून के दौरान बड़ी मात्रा में साल बीज का संग्रह होता है. प्रस्तावित प्‍लांट स‍िर्फ साल बीज तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें महुआ फल से निकलने वाले डोरी तेल के साथ-साथ कुसुम और नीम के बीजों से भी तेल निकाला जा सकेगा. इन तेलों का इस्‍तेमाल औषधीय, धार्मिक और घरेलू जरूरतों में किया जाता है.

आधुनिक मशीनों से आसान होगा उत्पादन

ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान में डोरी तेल सहित कई उत्पाद पारंपरिक तरीकों से तैयार किए जाते हैं, जिनमें ज्‍यादा समय और मेहनत लगती है. आधुनिक मशीनों के इस्‍तेमाल से तेल निष्कर्षण (Oil Extraction) की प्रक्रिया तेज और अधिक प्रभावी हो सकेगी. इससे उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ श्रम लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.

पशुपालकों को भी मिल सकता है फायदा

तेल निकालने के बाद बचने वाला अवशेष (खल) भी आर्थिक रूप से उपयोगी माना जाता है. इसमें प्रोटीन और स्टार्च की पर्याप्त मात्रा होती है, जिसका उपयोग पशु और पोल्ट्री आहार के रूप में किया जा सकता है. इससे ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत विकसित होने की संभावना है.

सफल रहा मॉडल तो अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार

वन विभाग का कहना है कि अगर डोंगानाला में प्रस्तावित प्रोसेसिंग यूनिट सफल रहती है तो भविष्य में अन्य वन क्षेत्रों में भी इसी तरह की इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं. इससे वन उपज आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ आदिवासी समुदायों की आजीविका के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं. (पीटीआई)

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