धरती ने झेला जहर, खाद कंपनियों ने कमाया मुनाफा...तो टैक्सपेयर क्यों उठाए खेतों को ठीक करने का खर्च?

धरती ने झेला जहर, खाद कंपनियों ने कमाया मुनाफा...तो टैक्सपेयर क्यों उठाए खेतों को ठीक करने का खर्च?

Khet Bachao Abhiyan: मुनाफे के चक्कर में खाद कंपनियों ने खेतों में घोला यूरिया का जहर. धरती हुई बंजर, पानी में घुला कैंसर! अब सरकार टैक्सपेयर के पैसे से चलाएगी 'खेत बचाओ अभियान'. इन मुनाफाखोरों की जवाबदेही कब तय होगी? क्या इन कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाकर बेजान हो चुके खेतों के इलाज का खर्च इनके मुनाफे से नहीं वसूला जाना चाहिए?

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धरती ने झेला जहर, खाद कंपनियों ने कमाया मुनाफा...तो टैक्सपेयर क्यों उठाए खेतों को ठीक करने का खर्च?खाद कंपनियों ने बिगाड़ी मिट्टी की सेहत

आज 1 जून से शुरू हो रहा केंद्र सरकार का 'खेत बचाओ अभियान' केवल मिट्टी सुधारने की सरकारी औपचारिकता भर नहीं है. यह देश की उन ताकतवर रासायनिक खाद कंपनियों के खिलाफ एक सीधी 'चार्जशीट' भी है, जिन्होंने सालों से भारतीय किसानों की आंखों पर पट्टी बांधे रखी. इस अभियान के पीछे का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि फायदे की मलाई तो फर्टिलाइजर कंपनियों ने खाई, पर जमीन में उनके फैलाए 'जहर' को साफ करने का भारी-भरकम खर्च देश के ईमानदार टैक्सपेयर की जेब से वसूला जा रहा है. खेती में यूरिया के आत्मघाती 'ओवरडोज' के लिए हमेशा किसानों को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन असली मास्टरमाइंड वे सफेदपोश खाद कंपनियां हैं, जिन्होंने अपनी तिजोरियां भरने के लिए देश की उपजाऊ धरती को वेंटिलेटर पर धकेल दिया.

यहां एक ऐतिहासिक सच को समझना बेहद जरूरी है. नब्बे के दशक तक देश में यूरिया और रासायनिक खादों का इस्तेमाल एक मजबूरी और जरूरत थी. उस दौर में देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाना और भुखमरी से बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. हरित क्रांति के उस दौर में खाद कंपनियों ने देश की खाद्यान्न सुरक्षा में अपनी भूमिका निभाई. लेकिन, असली गुनाह 90 के दशक के बाद शुरू हुआ. जब देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका था. तब इन कंपनियों का यह नैतिक और सामाजिक दायित्व था कि वे किसानों को जागरूक करतीं. उन्हें संतुलित खाद की सीख देतीं, लेकिन कंपनियों ने ऐसा नहीं किया. जागरूकता फैलाने से उनकी खाद की बिक्री घट जाती, इसलिए उन्होंने आंखें मूंद लीं. हरी-भरी फसलों का लालच दिखाकर सिर्फ बोरियां बेचने और मुनाफा कूटने का खेल बदस्तूर जारी रहा, जिसका दुष्पर‍िणाम आज हमारे सामने है. 

हर्जाना टैक्सपेयर की जेब से क्यों?

इस पूरे खेल की क्रोनोलॉजी को समझिए कि कैसे देश के करदाताओं को दोनों तरफ से लूटा जा रहा है. पहले तो इन फर्टिलाइजर कंपनियों को अरबों-खरबों रुपये की सरकारी सब्सिडी दी जाती है, जो सीधे टैक्सपेयर के पैसे से आती है. इसके बाद कंपनियां बेतहाशा यूरिया बेचकर अंधाधुंध मुनाफा कमाती हैं. किसानों की अज्ञानता और जमीन की बर्बादी की कीमत पर इन कंपनियों ने पिछले चार दशक में बड़ा आर्थ‍िक साम्राज्य खड़ा किया है. इन कंपन‍ियों की आक्रामक और लालची मार्केटिंग के कारण देश की मिट्टी बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है. अब खराब हो चुकी जमीन के इलाज के लिए चलाया जा रहा यह 'खेत बचाओ अभियान' भी टैक्सपेयर की गाढ़ी कमाई से ही फंड किया जा रहा है. सवाल उठता है कि खाद कंपनियों के इस लालच की वित्तीय जवाबदेही देश की जनता पर क्यों थोपी जा रही है?

केंचुए मार दिए, पानी में कैंसर घोल दिया 

कृष‍ि वैज्ञानिकों के मुताब‍िक मिट्टी की अच्छी सेहत के लिए N:P:K (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए. यानी 1 बोरी पोटाश पर अधिकतम 4 बोरी यूरिया डालना ही सुरक्षित है. लेकिन इन कंपनियों की आक्रामक मार्केटिंग के चलते राष्ट्रीय औसत 9.3 : 3.5 : 1 के डरावने स्तर पर पहुंच चुका है. एनपीके का अनुपात ब‍िगड़कर राजस्थान में 45.7:15:1, झारखंड में 37.3:11:1, पंजाब में 29.8:6.5:1 और हरियाणा में 29.2:7.3:1  तक पहुंच गया है. इस तबाही के बाद क्या इन कंपनियों को सिर्फ 'व्यापारी' माना जाए या धरती मां को बीमार करने का गुनहगार?

अंधाधुंध यूर‍िया और डीएपी बेचकर इन कंपनियों ने मिट्टी को जिंदा रखने वाले केंचुओं और सूक्ष्म जीवों का कत्ल कर दिया. आज देश की लाखों हेक्टेयर जमीन कड़क, ऊसर और बेजान हो चुकी है. खेतों में झोंका गया यूरिया पानी में घुलकर 'नाइट्रेट' बन चुका है. केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 440 जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय मानकों की सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है. WHO और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के अनुसार, पीने के पानी में नाइट्रेट की सुरक्षित सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर तय की गई है. नतीजा यह है क‍ि राजस्थान, पंजाब, हर‍ियाणा से लेकर यूपी-बिहार तक के गांवों में कैंसर जैसी बीमारी पैर पसार रही हैं.  

क‍िसानों को क्यों नहीं दी चेतावनी? 

जब सिगरेट के पैकेट पर फेफड़े खराब होने की चेतावनी लिखी जा सकती है, तो देश की खाद्य सुरक्षा और सेहत को तबाह करने वाले इन रासायनिक इनपुट्स पर 'खतरे का निशान' क्यों नहीं लगाया गया? खाद कंपनियों के फैलाए रायते को समेटने के लिए अब केंद्र सरकार को खुद 'खेत बचाओ अभियान' के तहत कृषि वैज्ञानिकों की फौज को गांव-गांव भेजना पड़ रहा है. सरकारी पैसे से मिट्टी की जांच होगी और किसानों को सही रास्ता दिखाया जाएगा. सरकार का यह कदम सराहनीय है, लेकिन जब तक इस संकट को खड़ा करने वाली फर्टिलाइजर कंपनियों की कॉलर नहीं पकड़ी जाएगी और उन पर भारी जुर्माना नहीं लगाया जाएगा, तब तक यह लड़ाई अधूरी है.

असल में तो यह अभ‍ियान रासायन‍िक खाद कंपन‍ियों से चलवाने चाह‍िए था. धरती की सेहत को लेकर इन कंपनियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए? जब क‍िसानों से फायदा इन कंपन‍ियों ने कमाया तो अभ‍ियान पर टैक्सपेयर का पैसा क्यों खर्च हो. देश का टैक्सपेयर रासायन‍िक खाद बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे की कीमत अपनी जेब और सेहत दोनों से क्यों चुकाए.

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