इथेनॉल उत्पादन पर सरकार का जवाबइथेनॉल बनाने में कितना चावल, मक्का या पानी लगता है, फीडस्टॉक के रूप में चावल की कीमत क्या होती है, इसे लेकर सरकार ने संसद में जवाब दिया है. इन सभी मुद्दों पर कई सवाल उठे हैं, जिसके बाद सरकार की ओर से आधिकारिक बयान आया है.
केंद्र सरकार ने राज्यसभा को बताया कि फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) ने जून 2025 से जून 2026 के बीच इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरीज को लगभग 63 लाख टन चावल सप्लाई किया. यह सप्लाई उसकी औसत खरीद लागत से लगभग 40 प्रतिशत कम कीमत पर की गई थी.
यह चावल 'ओपन मार्केट सेल स्कीम (घरेलू)' के तहत 2,250-2,320 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा गया, जबकि FCI की औसत खरीद लागत 2024-25 में 3,719.72 रुपये प्रति क्विंटल और 2025-26 में 3,889.46 रुपये प्रति क्विंटल थी. सप्लाई किए गए चावल की कुल कीमत 14,596.78 करोड़ रुपये थी. उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बांभनिया ने मंगलवार को राज्यसबा में सांसद अशोक सिंह के एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी.
संसद में एक और बड़ी जानकारी सामने आई. पिछले छह सालों में इथेनॉल बनाने के लिए चावल, मक्का और खराब अनाज का इस्तेमाल कई गुना बढ़ गया है. सरकार के इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम के तहत डिस्टिलरीज को बेचे जाने वाले अनाज में मक्के ने चावल को पीछे छोड़ दिया है.
बुधवार को लोकसभा में पेश किए गए खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि मौजूदा 2025-26 इथेनॉल सप्लाई ईयर (अक्टूबर से सितंबर) में जून के आखिर तक, EBP प्रोग्राम के तहत डिस्टिलरीज ने FCI के 54 लाख टन से अधिक सरप्लस चावल और खराब अनाज (टूटे हुए चावल सहित) का इस्तेमाल किया, जबकि मक्के का आंकड़ा लगभग 68 लाख टन था. मौजूदा इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) के अभी भी दो महीने बाकी हैं.
एक लीटर इथेनॉल बनाने में पानी का कितना खर्च होता है, इस सवाल के जवाब में भी सरकार ने सदन में अपनी बात रखी. सरकार ने राज्यसभा में बताया कि एक लीटर इथेनॉल बनाने में 3-5 लीटर 'प्रोसेस्ड' पानी खर्च होता है. पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने एक सवाल के जवाब में राज्यसभा में जानकारी दी. मंत्री ने बताया कि सरकार इथेनॉल बनाने में ऐसे फीडस्टॉक को बढ़ावा दे रही है जिसमें पानी का खर्च कम होता है. इसमें मक्के पर सबसे अधिक जोर है क्योंकि अपेक्षाकृत मक्का उगाने में कम पानी का खर्च है. मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि 2024 में कृषि मंत्रालय ने एक्सपर्ट कमेटी बनाई जो अलग-अलग फीडस्टॉक से इथेनॉल बनाने पर पानी के खर्च की रिपोर्ट देगी.
बुधवार को संसद को बताया गया कि इथेनॉल बनाने के लिए अतिरिक्त टूटे हुए चावल का इस्तेमाल करने से खाने-पीने की चीजों की महंगाई पर कोई असर नहीं पड़ रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इथेनॉल का उत्पादन तभी करने की इजाजत दी जाती है जब पर्याप्त बफर स्टॉक बनाए रखा जाए और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट (NFSA) और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं की जरूरतें पूरी कर ली जाएं.
लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में, खाद्य राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बांभनिया ने कहा कि बफर स्टॉक बनाए रखने और NFSA के तहत जरूरतों को पूरा करने के बाद, सरकार सेंट्रल पूल से सिर्फ अतिरिक्त चावल 'ओपन मार्केट सेल स्कीम' के तहत बेचती है, जिसे बाद में इथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
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