जेनेटिक रिसोर्सेज मैनेजमेंट कमेटी की बैठकदेश की खाद्य और पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आजीविका को मजबूत बनाने के लिए जेनेटिक रिसोर्स (आनुवंशिक संसाधनों) के बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है. इसी दिशा में राष्ट्रीय आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन सलाहकार बोर्ड (NABMGR) की पहली बैठक 29 जुलाई 2026 को आईसीएआर-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (ICAR-NBPGR), नई दिल्ली में आयोजित की गई.
इस बोर्ड का पुनर्गठन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने किया है. बोर्ड की अध्यक्षता कृषि वैज्ञानिक पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा कर रहे हैं, जबकि कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट इसके सह-अध्यक्ष हैं.
बैठक में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), बायोटेक्नोलॉजी विभाग (DBT), पर्यावरण मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड, नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया, बायोवर्सिटी इंटरनेशनल, आईसीएआर के अलग-अलग संस्थानों के विशेषज्ञ, किसान प्रतिनिधि और अन्य विशेषज्ञ शामिल हुए.
बैठक को संबोधित करते हुए डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा कि भारत के पास पौधों, पशुओं, मछलियों, सूक्ष्म जीवों और कीटों की विशाल आनुवंशिक विविधता है. यह देश की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति है, जो खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने और टिकाऊ कृषि विकास में अहम भूमिका निभाती है.
उन्होंने कहा कि संरक्षित जर्मप्लाज्म और जंगली प्रजातियों का उपयोग फसल, पशु और मत्स्य सुधार कार्यक्रमों में अधिक किया जाना चाहिए. इससे जलवायु अनुकूल और अधिक उत्पादक किस्मों के विकास को गति मिलेगी.
डॉ. परोदा ने 2016 में आयोजित पहले अंतरराष्ट्रीय एग्रोबायोडायवर्सिटी कांग्रेस का जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली घोषणा पत्र की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है. उन्होंने मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ आनुवंशिक संसाधनों के आदान-प्रदान और सहयोग को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया.
उन्होंने कहा कि कपास, रामबुटान, एवोकाडो, मैंगोस्टीन जैसी फसलों और कुछ पशु नस्लों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाना भविष्य की कृषि जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण होगा.
बैठक में डॉ. परोदा ने पौध किस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण कानून (PPV&FRA) की तर्ज पर पशुधन और मत्स्य आनुवंशिक संसाधनों के लिए भी उपयुक्त कानूनी ढांचा तैयार करने की जरूरत बताई. उनका कहना था कि इससे इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा और पशुपालकों और मछली पालकों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी.
डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि आनुवंशिक संसाधनों के प्रबंधन को मिट्टी विज्ञान, डिजिटल कृषि और फसल सुधार कार्यक्रमों से जोड़ना जरूरी है. इससे अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल किस्मों की पहचान आसान होगी और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषि प्रणालियों का विकास तेज होगा.
उन्होंने कहा कि आईसीएआर के नेतृत्व में देश ने एक मजबूत कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली विकसित की है, जिसने आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
बैठक के दौरान आईसीएआर के छह राष्ट्रीय ब्यूरो के निदेशकों ने वर्ष 2021 से 2026 के बीच की उपलब्धियों की जानकारी दी और 2026-2031 के लिए अपना रोडमैप पेश किया. इसमें जैव विविधता संरक्षण, जलवायु अनुकूल कृषि, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े कार्यक्रमों पर विशेष फोकस रखा गया.
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