प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है केंद्र सरकारदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अध्ययोन में सामने आया है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से फसल उत्पादन में सुधार, मिट्टी की क्वालिटी में वृद्धि और खेती की लागत में कमी आई है. यही वजह है कि सरकार किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर आकर्षित करने के लिए आर्थिक सहायता भी दे रही है.
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के दौरान बताया कि आईसीएआर ने साल 2020-21 में अखिल भारतीय प्राकृतिक कृषि नेटवर्क कार्यक्रम के तहत अलग-अलग राज्यों में प्राकृतिक खेती पर बड़ा अध्ययन शुरू किया था. इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक जांच करना, कई फसल सिस्टम का मूल्यांकन करना और किसानों के लिए बेहतर खेती मॉडल तैयार करना है.
आईसीएआर का यह कार्यक्रम देश के 16 राज्यों में फैले 20 सहयोगी केंद्रों के जरिये चलाया जा रहा है. इसमें 11 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 8 आईसीएआर संस्थान और एक डीम्ड विश्वविद्यालय शामिल हैं. रिसर्च के तहत अलग-अलग जलवायु और कृषि परिस्थितियों में प्राकृतिक खेती के रिजल्ट का अध्ययन किया जा रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक खेती केवल केमिकल खादों का विकल्प नहीं है, बल्कि यह मिट्टी, पानी और पर्यावरण को बेहतर बनाते हुए टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
आईसीएआर के अध्ययन में पाया गया कि यदि प्राकृतिक खेती को सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से अपनाया जाए तो पैदावार में सुधार संभव है. कई किसानों के अनुभवों से यह भी पता चला कि शुरुआती वर्षों में मिट्टी की क्वालिटी सुधारने पर फसलों की क्वालिटी, स्वाद और लंबे दिनों के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ती है.
प्राकृतिक खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च कम हो जाता है. इससे किसानों का शुद्ध मुनाफा बढ़ता है. मल्चिंग जैसी तकनीकों के उपयोग से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, खरपतवार नियंत्रित होते हैं और मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है.
अध्ययन के अनुसार प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी के जैविक कार्बन (SOC) स्तर में वृद्धि दर्ज की गई है. हिमालयी क्षेत्रों में हुए परीक्षणों में मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन स्तर लगभग 0.90 प्रतिशत से बढ़कर 1.15 प्रतिशत तक पहुंच गया. वैज्ञानिकों ने पाया कि प्राकृतिक खेती की मिट्टी में लाभकारी जीवाणु, कवक और अन्य सूक्ष्मजीव अधिक संख्या में मौजूद रहते हैं. इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और लंबे समय तक अच्छी पैदावार बनाए रखने में मदद मिलती है.
आईसीएआर के नेटवर्क रिसर्च में अलग-अलग राज्यों के लिए फसल आधारित प्राकृतिक खेती मॉडल तैयार किए गए हैं. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में प्राकृतिक खेती के तहत सोयाबीन, मक्का, सब्जी मटर और धनिया वाले फसल सिस्टम में पांच वर्षों के दौरान औसत उत्पादकता जैविक खेती और एकीकृत फसल प्रबंधन से लगभग 5 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई.
वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सोयाबीन, मक्का, गेहूं और सरसों आधारित फसल प्रणाली की उत्पादकता प्राकृतिक खेती में पारंपरिक एकीकृत फसल प्रबंधन के बराबर पाई गई. राजस्थान और गुजरात में भी प्राकृतिक खेती के रिजल्ट संतोषजनक रहे और उत्पादकता एकीकृत कृषि प्रबंधन के बराबर दर्ज की गई.
प्राकृतिक खेती को लेकर नीति आयोग की मूल्यांकन रिपोर्ट में भी सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं. रिपोर्ट के अनुसार लगभग 91.2 प्रतिशत किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद फसल उत्पादकता बढ़ने और मिट्टी की दशा में सुधार होने की बात कही. इसके अलावा 90.1 प्रतिशत किसानों ने माना कि प्राकृतिक खेती से उनकी उत्पादन लागत कम हुई है, जिससे खेती अधिक लाभदायक बनी है.
केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती मिशन के तहत किसानों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करा रही है. योजना के अनुसार किसानों को प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4,000 रुपये की उत्पादन आधारित आर्थिक मदद दी जाएगी.
यह सहायता लगातार दो वर्षों तक मिलेगी और एक किसान अधिकतम एक एकड़ भूमि के लिए इसका लाभ ले सकेगा. इस पैसे का उपयोग किसान प्राकृतिक खेती अपनाने, ट्रेनिंग लेने, पशुधन के रखरखाव, जैविक घोल बनाने, भंडारण कंटेनर खरीदने और जैव-संसाधन केंद्रों से जरूरी सामान लेने में कर सकेंगे.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की गिरती क्वालिटी और केमिकल के अधिक उपयोग के बीच प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रही है. आईसीएआर और नीति आयोग के अध्ययनों से मिले अच्छे रिजल्ट के बाद उम्मीद की जा रही है कि आने वाले साल में अधिक किसान इस पद्धति को अपनाएंगे, जिससे खेती की लागत घटेगी, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.
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