Explainer: मराठवाड़ा में पिछले साल 1023 किसानों ने दी जान, ये रही वजह

Explainer: मराठवाड़ा में पिछले साल 1023 किसानों ने दी जान, ये रही वजह

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में आठ जिले आते हैं. इन जिलों में कहीं सूखा तो कहीं भारी बारिश देखी जाती है. इन दोनों परिस्थितियों में किसानों की फसल मारी जाती है. यह पूरा क्षेत्र कृषि प्रधान है और किसानों की फसल चौपट होने पर वे खतरनाक कदम (farmers suicide) उठाने को मजबूर होते हैं. हालांकि सरकारी सहायता उन्हें मिलती रही है.

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Explainer: मराठवाड़ा में पिछले साल 1023 किसानों ने दी जान, ये रही वजहमराठवाड़ा में किसानों की आत्महत्या (farmers suicide) की घटनाएं बढ़ी हैं

महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र किसानों के लिए 'काल' बना हुआ है. यहां किसानों की खुदकुशी (farmers suicide) की घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रहीं. एक आधिकारिक आंकड़े से पता चलता है कि पिछले साल मराठवाड़ा इलाके में 1023 किसानों की आत्महत्या की वारदात (marathwada farmers suicide) सामने आई. उससे पहले 2021 में 887 किसानों ने आत्महत्या की थी. औरंगाबाद के डिविजनल कमिश्नर ऑफिस ने इसकी जानकारी दी है. मराठावाड़ा क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र है, लेकिन यहां खेती-बाड़ी तभी आबाद होती है जब बारिश हो. सिंचाई की व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं होने और पानी की घोर कमी के चलते यहां खेती तभी होती है जब बारिश हो. बारिश नहीं होने से किसानों की फसलें बर्बाद होती हैं कर्ज में डूबे किसान खुदकुशी कर लेते हैं.

मराठवाड़ा क्षेत्र में जालना, औरंगाबाद, परभनी, हिंगोली, नांदेड, लातूर, उस्मानाबाद और बीड जिले आते हैं. चौंकाने वाली बात ये है कि 2001 में मराठवाड़ा में आत्महत्या की केवल एक घटना सामने आई, लेकिन बाद में इसमें तेजी से वृद्धि देखी गई. मराठवाड़ा के आठ जिलों का आंकड़ा देखें तो साल 2001 से अभी तक 10,431 किसानों ने खुदकुशी (farmers suicide) की है. डिविजनल कमिश्नरेट दफ्तर से इस बात की जानकारी सामने आई है.

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सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2001 से 2010 के बीच सबसे अधिक 379 मौतें 2006 में दर्ज की गईं. वहीं 2011 से 2020 के दशक में आत्महत्या की सबसे अधिक घटनाएं 2015 में दर्ज हुईं और 1133 किसानों ने जान दे दी. 2001 से अभी तक कुल 10,431 आत्महत्याओं की घटनाओं में 7605 किसानों को सरकार की तरफ से सहायता मिली थी. इसके बावजूद किसानों को खुदकुशी (marathwada farmers suicide) जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

वजहों के बारे में कहा जाता है कि पिछले कुछ साल से मराठवाड़ा क्षेत्र में कहीं गंभीर सूखा तो कहीं भारी बारिश दर्ज की जा रही है. यानी मराठवाड़ा के किसी जिले में भारी सूखा पड़ जाता है तो किसी जिले में भारी बारिश हो जाती है. न दोनों परिस्थितियों में किसानों की फसल मारी जाती है. सिंचाई की अच्छी व्यवस्था नहीं होने से सूखा पड़ते ही फसल मारी जाती है. भारी बारिश होने से फसलें डूब जाती हैं क्योंकि जल निकासी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है. ऐसे में जिन किसानों ने कर्ज लेकर खेती की होती है, उनके लिए जीने-मरने का सवाल हो जाता है.

मराठवाड़ा में जो कुछ सिंचाई के साधन हैं, उन साधनों या नेटवर्क का भी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं होता जिससे सूखे की गंभीर स्थिति पैदा हो जाती है. यहां उस्मानाबाद जिले में किसानों के लिए काउंसलिंग सेंटर चलाने वाले विनायक हेगाना 'PTI' से कहते हैं कि किसानों की खुदकुशी (farmers suicide) का मामला समझने और उसके विश्लेषण के लिए बहुत बारीकी से गौर करना होगा. वे कहते हैं, किसानों से जुड़ी नीतियां ऊपरी स्तर पर बनाई जाती हैं, लेकिन निचले स्तर पर उसके अनुपालन में सुधार और तेजी दिखनी चाहिए.

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विनायक हेगाने कहते हैं, जुलाई से अक्टूबर के बीच सबसे अधिक किसान आत्महत्या की घटनाएं होती थीं. लेकिन अब ये पैटर्न बदल चुका है. अब हम दिसंबर से जून के बीच संख्या में इजाफा देख रहे हैं. खुदकुशी कैसे रोकी जाए, इसके बारे में हेगाने कहते हैं कि नीतियों में खामियों को देखा जाए, उसे दूर किया जाए और उसे किसानों के लिए अच्छा बनाया जाए. यह लगातार चलने वाला प्रोसेस होना चाहिए और इस काम में लोगों के समूह को जोड़ा जाना चाहिए.

एक और बड़ी वजह की ओर इशारा करते हुए महाराष्ट्र विधान परिषद् के नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे कहते हैं, अभी घटिया किस्म के बीज और खाद बढ़े-चढ़े दामों पर बेचे जा रहे हैं. यह खेती-किसानी के लिए खतरनाक है. किसानों के कई लोन माफ हुए हैं, लेकिन यह गौर करने वाली बात है कि किसान क्यों खुदकुशी (marathwada farmers suicide) कर रहे हैं. जब हम किसानों के लोन माफ करें तो यह भी देखना चाहिए कि उनकी उपज और रिटर्न को कैसे बढ़ाया जा सकता है.

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