पूसा बासमती-1121 की कहानी. मुजफ्फरनगर का दतियाना गांव और वहां एक फूफा-भतीजे का संवाद. किसे पता था कि यह बातचीत दुनिया के सबसे लंबे चावल की पटकथा लिख रही है. किसान मेघराज सिंह खोखर ने जब बासमती की खुशबू और बनावट का खाका खींचा, तो पूसा में नए-नए भर्ती हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. विजयपाल सिंह ने उसे अपनी रिसर्च का लक्ष्य बना लिया. आज वही 'पूसा बासमती-1121' एक वैश्विक ब्रांड है, जिसकी जड़ें एक किसान के पारंपरिक ज्ञान में बसी हैं. साल 1968 पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शुरू हुई यह कहानी सिर्फ एक चावल की किस्म की नहीं, बल्कि एक किसान के अटूट अनुभव और एक वैज्ञानिक के जुनून की मिसाल है.
फूफा के उसी 'देसी विजन' ने 40 साल बाद 'पूसा 1121' के रूप में दुनिया के किचन पर राज करने वाली बासमती चावल की किस्म तैयार हुई. जो आज अकेले इस किस्म के दम पर भारत सालाना लगभग 25,000 करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार भर रहा है. किसान मेघराज सिंह खोखर ने पूसा के वैज्ञानिक को बासमती की जो परिभाषा दी, वह किसी शोध पत्र से कम नहीं थी. उनका मानना था कि आदर्श बासमती का दाना पकने के बाद सुई की तरह लंबा और सुडौल होना चाहिए, उसकी महक इतनी तीक्ष्ण हो कि पड़ोसियों को भी पता चल जाए कि घर में बासमती बन रहा है. पकाने पर चावल पांच गुना तक फूलना चाहिए और वह मक्खन की तरह मुलायम और पाचक होना चाहिए.
डॉ. विजय पाल सिंह ने खोखर द्वारा सुझाए गए इन्हीं पारंपरिक मानकों को अपने शोध का आधार बनाया. वर्षों की तपस्या के बाद दुनिया को 'पूसा बासमती-1121' के रूप में एक नायाब तोहफा मिला. वैज्ञानिकों का लक्ष्य वही असाधारण लंबाई और खुशबू हासिल करना था, जिसका सपना खोखर देखा करते थे. बेशक, यदि डॉ. विजय पाल सिंह इस क्रांति के 'निर्माता' हैं, तो मेघराज सिंह खोखर इसके 'विज़नरी' थे. खोखर ने ही वैज्ञानिकों को यह दिशा दी कि एक विश्व-स्तरीय बासमती की असली पहचान क्या होनी चाहिए. आज यह किस्म भारतीय किसान के पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के सफल मिलन का जीवंत प्रमाण है.
किसान तक के पॉडकास्ट 'अन्नगाथा' में पद्मश्री डॉ. विजयपाल सिंह ने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध और प्रीमियम बासमती किस्म, पूसा बासमती 1121, के विकसित होने की बेहद दिलचस्प कहानी साझा की. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा द्वारा विकसित इस किस्म का चावल सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट होता है. इसे विकसित करने का मुख्य श्रेय पद्मश्री डॉ. विजय पाल सिंह (Dr. Vijaipal Singh) को जाता है, जो पूसा में एक प्रमुख कृषि वैज्ञानिक रहे हैं. मेघराज सिंह खोखर उनके फूफा थे. खोखर ने डॉ. विजयपाल सिंह को ही बताया था कि बासमती चावल के क्या गुण होने चाहिए.
इसी विज़न को आधार बनाकर डॉ. सिंह ने एक व्यापक क्रॉस-ब्रीडिंग प्रोग्राम का नेतृत्व किया, जिसके कठिन शोध के बाद वर्ष 2008 में यह किस्म आधिकारिक रूप से नोटिफाई हुई. डॉ. सिंह ने पारंपरिक बासमती की खुशबू और आधुनिक तकनीक का ऐसा बेमिसाल तालमेल बिठाया कि पूसा 1121 ने दाने की लंबाई के मामले में विश्व रिकॉर्ड कायम कर दिया. इसका कच्चा दाना जहाँ 8.5 मिमी लंबा होता है, वहीं पकने के बाद यह 20 से 25 मिमी तक लंबाई में बढ़ जाता है. अपनी इसी असाधारण लंबाई और गुणवत्ता के कारण इस किस्म को 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में स्थान प्राप्त हुआ. इस समय भारत सालाना लगभग 50 हजार करोड़ रुपये के बासमती चावल का एक्सपोर्ट करता है, जिसमें से करीब 50 फीसदी हिस्सेदारी पूसा बासमती-1121 की बताई जाती है.
बासमती की दुनिया में पूसा-1121 का सफर आसान नहीं था. राइस इंडस्ट्री के भीतर की खींचतान और वाणिज्य मंत्रालय की तकनीकी आपत्तियों के कारण शुरुआत में इसे 'बासमती' का दर्जा नहीं मिल सका था. जब यह 2003-04 में रिलीज हुई, तो इसका आधिकारिक नाम 'पूसा सुगंध-4' रखा गया था, लेकिन अपनी असाधारण खूबियों के कारण जब इसकी चर्चा वैश्विक स्तर पर होने लगी, तब इसे बासमती का नाम देने की कवायद शुरू हुई.
इसके लिए बासमती की पुरानी परिभाषा को बदलना पड़ा. पहले के नियमों के अनुसार, किसी भी नई किस्म को 'बासमती' तभी कहा जा सकता था जब उसके माता-पिता में से कोई एक 6 पारंपरिक किस्मों में से हो. पूसा सुगंध-4 बासमती की वंशावली से तो थी, लेकिन इसमें पारंपरिक किस्मों का कोई 'डायरेक्ट पैरेंट' नहीं था.
अंतत, बासमती की परिभाषा से 'डायरेक्ट पैरेंट' होने की अनिवार्य शर्त को हटाया गया. इसके बाद, वर्ष 2008 में सीड एक्ट-1966 के तहत इसका 'री-नोटिफिकेशन' किया गया और 'पूसा सुगंध-4' का नाम बदलकर 'पूसा बासमती-1121' कर दिया गया् इस बदलाव ने भविष्य के लिए भी रास्ता खोल दिया कि यदि किसी नई किस्म में बासमती पीढ़ी के अंश मौजूद हैं, तो उसे बासमती की श्रेणी में गिना जा सकता है. आज यही ऐतिहासिक फैसला भारत के हजारों करोड़ के चावल निर्यात का आधार बना हुआ है.
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