मसालों और सब्जियों में छिपा है ‘सोना’ (AI- तस्वीर)भारत में खेती की बात होते ही अक्सर गेहूं-धान का जिक्र होता है, लेकिन असली “सोना” तो मसालों और सब्जियों की दुनिया में छिपा है. भारत में अब मसालों और सब्जियों की खेती सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे नेचुरल कलर और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट भी बनाए जा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि फूड, फार्मास्युटिकल व कॉस्मेटिक प्रोडक्ट में इस्तेमाल होने वाले नेचुरल कलर (Natural Edible Color) का करीब 70 फीसदी भारत से जाता है. उसमें से भी सबसे ज्यादा मिर्च, गेंदा के फूल और हल्दी से निकाला जा रहा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) में फूल, सब्जियों और मसालों के एडिशनल डायरेक्टर जनरल डॉ. सुधाकर पांडे ने इसके बारे में रोचक जानकारी 'किसान तक' के पॉडकास्ट अन्नगाथा (Annagatha) में दी.
डॉ. पांडेय के मुताबिक, इनमें से लगभग 60 फीसदी नेचुरल रंग सिर्फ मिर्च से निकाले जाते हैं. यानी मिर्च अब सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा औद्योगिक उत्पाद बन चुकी है. मिर्च से निकाले जाने वाले “ओलियोरेसिन” का उपयोग खाने के रंग, कॉस्मेटिक और यहां तक कि लिपस्टिक बनाने में भी किया जा रहा है. ओलियोरेसिन मसालों और मिर्च से निकाला गया एक गाढ़ा, चिपचिपा और प्राकृतिक अर्क है, जिसमें मसाले का सुगंधित तेल और स्वाद देने वाला रेज़िन दोनों शामिल होते हैं. इसके अलावा हल्दी और गेंदे के फूल से भी बड़े पैमाने पर प्राकृतिक रंग तैयार होते हैं.
मिर्च से जेक्सैंथिन (Zeaxanthin) और ल्यूटिन (Lutein) निकाला जा रहा है. जेक्सैंथिन और ल्यूटिन शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट कैरोटीनॉयड हैं, जो मुख्य तौर पर आंखों को हेल्दी रखते हैं. इसलिए आंखों की दवा बनाने में इसका इस्तेमाल हो रहा है. गेंदा फूल और हल्दी से भी नेचुरल कलर निकालकर उनका इस्तेमाल फूड, फीड और दवाइयों में किया जा रहा है. खास बात यह है कि तमिलनाडु में कई किसान अब गेंदा की खेती सिर्फ इन औद्योगिक उपयोगों के लिए कर रहे हैं और कंपनियों के साथ सीधे समझौता करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. काशी सिंदूरी (VPBC-535) नामक मिर्च की किस्म का उपयोग लिपस्टिक बनाने के काम में हो रहा है. इस किस्म को भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) ने डेवलप किया है.
डॉ. पांडेय ने बताया कि मसाले सिर्फ स्वाद और खुशबू के लिए नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद जरूरी हैं. खासकर कोरोना के बाद लोगों में हल्दी, अदरक और अन्य मसालों का उपयोग काफी बढ़ा है, क्योंकि ये इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं. उन्होंने बताया कि भारत मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक है, लेकिन इसके बावजूद कुछ मसालों के लिए हमें दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. हींग, स्टार ऐनीस (चक्र फूल) और केसर जैसे मसाले अभी भी बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं. हालांकि वैज्ञानिक इनकी खेती भारत में शुरू करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे भविष्य में आयात कम हो सकता है.
डॉ. पांडेय के अनुसार, हल्दी किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और इसकी स्टोरेज (भंडारण) भी आसान है. प्रोसेसिंग के बाद इसकी शेल्फ लाइफ और बढ़ जाती है, जिससे किसान बेहतर कीमत पा सकते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि मसालों और फूलों से जुड़ी इंडस्ट्री, जैसे अरोमा (खुशबू) और औषधीय उत्पाद, तेजी से बढ़ रही है. गेंदे के फूल से निकलने वाले ल्यूटिन और जेक्सैंथिन जैसे तत्व दवाइयों और पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होते हैं, जिसकी विदेशों में भारी मांग है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अनाज की तुलना में फल और सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ेगी. लोगों की बदलती खानपान आदतें और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता इसका मुख्य कारण है. यही वजह है कि किसानों को अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ मसाले, सब्जियां और फूलों की खेती की ओर भी ध्यान देना चाहिए.
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