अल नीनो का खेती-बाड़ी पर प्रभाव खतरनाक साबित हो सकती हैसाल 2026 की दूसरी छमाही में 'अल नीनो' एक बार फिर भारत में दस्तक देने जा रहा है. इसके आने की आहट से ही खेती-किसानी पर सूखे का बड़ा साया मंडराने लगा है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार हालात बेहद नाजुक हो सकते हैं. आसान शब्दों में कहें, तो अल नीनो का मतलब प्रशांत महासागर के पानी का जरूरत से ज्यादा गर्म होना है. यह कोई मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि इसका सीधा और बुरा असर हमारे मॉनसून पर पड़ता है. जब भी अल नीनो का असर होता है, भारत में मॉनसून की बारिश एकदम सुस्त पड़ जाती है और देश में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं. इस साल इसके चलते पूरे दक्षिण एशिया और खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम का संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है, जिससे हर कोई फिक्रमंद है.
यह कोई पहली बार नहीं है जब अल नीनो हमारी रातों की नींद उड़ा रहा है. इससे पहले साल 2014, 2018 और हाल ही में 2023-24 में इसने भारतीय मॉनसून को भारी नुकसान पहुंचाया था. आपको याद होगा कि साल 2024 में इसी वजह से देश में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी थी, जिसका सीधा असर फसलों पर हुआ था. उस वक्त धान और दालों की पैदावार बहुत घट गई थी, जिससे बाजार में अनाज के दाम आसमान छूने लगे थे और आम आदमी का बजट बिगड़ गया था. इस बार भी मौसम विभाग ने मॉनसून में देरी और जानलेवा लू चलने की सख्त आशंका जताई है.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जून से सितंबर के बीच अल नीनो का असर गहराता है, तो किसानों को धान की खेती की अपनी पुरानी रणनीति को फौरन बदलना होगा. धान की जो पारंपरिक या पुरानी किस्में हैं, वे बहुत ज्यादा पानी सोखती हैं. इस सूखे के दौर में उन्हें उगाना घाटे का सौदा साबित होगा. अगर हम पानी के खर्च के आंकड़ों पर नजर डालें, तो आंखें फटी की फटी रह जाती हैं. महज 1 किलो चावल पैदा करने के लिए कम समय वाली किस्में लगभग 3,000 लीटर पानी पी जाती हैं.
वहीं, मध्यम समय वाली किस्मों को तैयार करने में 3,500 से 4,000 लीटर पानी का खर्च आता है. अगर लंबी अवधि वाली पारंपरिक किस्मों की बात करें, तो उन्हें पकाने के लिए पूरे 5,000 लीटर पानी की जरूरत होती है. ऐसी नाजुक परिस्थिति में समझदारी इसी में है कि किसान उन किस्मों को चुनें जो बहुत कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं.
आमतौर पर धान की फसल को पकने में 120 से 150 दिनों का लंबा वक्त लगता है. धान की अवधि को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला- कम अवधि 110 से 120 दिन, दूसरा- मध्यम अवधि 120 से 135 दिन और तीसरा- लंबी अवधि 135 दिनों से ज्यादा. सीधी सी बात है कि फसल जितने ज्यादा दिनों तक खेत में खड़ी रहेगी, वह उतना ही ज्यादा पानी निगलेगी. मिसाल के तौर पर, 'बासमती 370' जैसी पुरानी किस्में बहुत ज्यादा पानी मांगती हैं, जबकि 'पूसा बासमती 1509' जैसी आधुनिक किस्में कम दिनों और कम पानी में तैयार हो जाती हैं.
धान के जीवन में तीन मौके ऐसे आते हैं जब उसे पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है- रोपाई का समय, कल्ले फूटने का वक्त और बालियां निकलने का दौर. इस संकट से पार पाने के लिए वैज्ञानिक 'क्रॉप डायवर्सिफिकेशन' यानी फसलों को बदलकर बोने की सलाह दे रहे हैं. हमें धान की जिद छोड़कर उन फसलों को चुनना चाहिए जो कम पानी में भी बंपर पैदावार देती हैं. जैसे, किसानों को अपने ऊंचे खेतों में दलहन (दालें) उगानी चाहिए. वहीं, समतल जमीन पर मक्का और बाजरा जैसे मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती पर जोर देना चाहिए, जिन्हें नाममात्र की सिंचाई की जरूरत होती है.
हमारे देश में धान की सबसे ज्यादा पैदावार उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा के भरोसे होती है. लेकिन इस साल इन राज्यों के सामने बहुत बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश की बात करें, तो पूर्वी और पश्चिमी यूपी में धान की फसल को पूरे सीजन में प्रति एकड़ लगभग 18 लाख से 31 लाख लीटर तक पानी चाहिए होता है. वहीं, बिहार में प्रति एकड़ 21 लाख से 25 लाख लीटर पानी की खपत होती है.
यूपी और बिहार के मैदानी इलाकों की मिट्टी ज्यादातर मटियार या दोमट होती है, जिसमें पानी को लंबे समय तक रोक कर रखने की कुदरती क्षमता होती है. इन दोनों राज्यों में धान की खेती पूरी तरह मॉनसून की बारिश के रहम-ओ-करम पर टिकी होती है. बिहार में आज भी आधुनिक सिंचाई के साधनों की कमी है, जिसकी वजह से वहां के किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए रहते हैं और बारिश के पानी को ही खेतों में रोककर काम चलाते हैं, जिसे 'लेवा' या 'कदो करना' भी कहा जाता है. इस बार अगर अल नीनो के कारण मॉनसून रूठा, तो करोड़ों किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है.
अब जरा नजर डालते हैं पंजाब और हरियाणा की तरफ, जहां खेती का तरीका बेहद आधुनिक और मशीनों से लैस है, लेकिन इसके साथ ही यहां पानी की बर्बादी और खपत का ग्राफ यूपी-बिहार के मुकाबले कहीं ज्यादा ऊंचा है. इन दोनों राज्यों की मिट्टी थोड़ी रेतीली है, जिसकी वजह से उसमें पानी रोकने की ताकत बहुत कम होती है. ऊपर से गर्मियों में यहां की तपिश इतनी तेज होती है कि खेतों का पानी देखते ही देखते भाप बनकर उड़ जाता है. यही वजह है कि यहां प्रति एकड़ धान उगाने के लिए लगभग 18 लाख से 33 लाख लीटर पानी झोंकना पड़ता है.
पंजाब और हरियाणा में बारिश बहुत कम होती है, इसलिए किसान अपनी फसलों को जिंदा रखने के लिए पूरी तरह ट्यूबवेल और नहरों पर निर्भर हैं. धान की लंबी अवधि वाली किस्में महीनों तक खेतों में खड़ी रहती हैं, जिसे सींचने के लिए किसान दिन-रात जमीन से अंधाधुंध पानी खींच रहे हैं. नतीजा यह हुआ है कि यहां भूजल ग्राउंडवाटर का स्तर बहुत खतरनाक ढंग से नीचे गिर चुका है और कई इलाके 'डार्क जोन' में बदल चुके हैं. इसी खौफनाक मंजर को देखते हुए अब इन दोनों राज्यों में कम पानी पीने वाली और जल्द पकने वाली धान की किस्मों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है.
इस जल संकट और अल नीनो के खतरे से अपनी खेती को सुरक्षित रखने के लिए किसानों को नए और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना होगा. इस सिलसिले में सबसे पहली और कामयाब तकनीक है 'धान की सीधी बुवाई' (Direct Seeded Rice - DSR). इस तरीके में खेत को पडलिंग करने की जरूरत नहीं होती और सीधे बीजों को खेत में बो दिया जाता है, जिससे तकरीबन 18% से 28% तक पानी की सीधी बचत होती है.
इसके अलावा, एक और बेहतरीन तरीका है 'AWD' (Alternate Wetting and Drying) यानी वैकल्पिक गीला और सूखा तरीका. इसमें खेत को हर वक्त पानी से लबालब भरकर रखने के बजाय, बीच-बीच में उसे थोड़ा सूखने दिया जाता है और फिर जरूरत के मुताबिक सिंचाई की जाती है. इस तरकीब से पानी की करीब 37 फीसदी तक बचत की जा सकती है.
इसके साथ ही, खेतों को समतल करने के लिए 'लेजर लैंड लेवलर' मशीन का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है. अगर हमारे किसान भाई इन आधुनिक तरीकों और सूखा-प्रतिरोधी फसलों को अपना लें, तो हम अल नीनो के इस बड़े खतरे के बीच भी अपनी खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बना सकते हैं.
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