इथेनॉल में 10,000 लीटर पानी खपत वाली डिबेट में कूदा ISMA, यहां समझ‍िए दावे और हकीकत का गण‍ित

इथेनॉल में 10,000 लीटर पानी खपत वाली डिबेट में कूदा ISMA, यहां समझ‍िए दावे और हकीकत का गण‍ित

चावल से इथेनॉल उत्पादन में पानी की भारी खपत को लेकर उठे विवाद के बीच ISMA ने 10,000 लीटर पानी के आंकड़े को खारिज किया है, लेकिन ठोस तर्क नहीं दिया. साथ ही उसने अपनी स्‍टडी में गन्‍ने से इथेनॉल को सबसे इफिशिएंट बताया है.

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इथेनॉल में 10,000 लीटर पानी खपत वाली डिबेट में कूदा ISMA, यहां समझ‍िए दावे और हकीकत का गण‍ितइथेनॉल और पानी की खपत

चावल से इथेनॉल बनाने में बेतहाशा पानी की खपत का मुद्दा उठने के बाद उद्योगों के कई संगठन बेचैन हैं. ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के बाद इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) भी इसमें कूद गया है. उसने चावल से एक लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से अध‍िक पानी के आंकड़े को खार‍िज कर द‍िया है, लेक‍िन उसके पीछे कोई तर्क नहीं द‍िया है. जबक‍ि नीत‍ि आयोग की र‍िपोर्ट भी चीख-चीखकर क‍िसान तक-इंड‍िया टुडे की र‍िपोर्ट की तस्दीक कर रही है. बहरहाल, इस्मा ने कहा है क‍ि सबसे कम पानी गन्ने से इथेनॉल बनाने में लगता है. 

स्‍टडी में किसानों की 'कमजोर हालत' पर छिड़का नमक

ISMA ने कहा है क‍ि गन्ना उतना “पानी खर्च करने वाला” नहीं है, जितना आमतौर पर माना जाता है. इस संगठन ने पानी की ज्यादा खपत के ल‍िए क‍िसानों को ही कटघरे में खड़ा कर द‍िया है. संगठन ने कहा है क‍ि पारंपरिक खेती में 1 किलोग्राम गन्ना उत्पादन के लिए करीब 173 लीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि ड्रिप सिंचाई अपनाने पर यह घटकर लगभग 114 लीटर रह जाती है.

ISMA की स्टडी के अनुसार, गन्ने से बने इथेनॉल में पारंपरिक सिंचाई के तहत करीब प्रति लीटर इथेनॉल 2,469 लीटर पानी लगता है, जबकि ड्रिप सिंचाई में यह घटकर लगभग 1,634 लीटर रह जाएगा. अब इनसे पूछा जाना चाह‍िए क‍ि क्या पूरे देश के गन्ना बेल्ट में ड्र‍िप स‍िंचाई का प्लांट लग सकता है? क्या क‍िसान इसके ल‍िए सक्षम हैं?

इंडस्ट्री की तकनीक पर सवाल

ISMA ने यह सब दावा तब क‍िया है जब भारत सरकार पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को तेजी से बढ़ा रही है, ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके. दूसरी तरफ, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भूजल दोहन को लेकर गन्ने की खेती पर सवाल उठते रहे हैं. भारत में इथेनॉल प्रमुख तौर पर गन्ना, मक्का और चावल से सीधे बनता है. 

यानी इथेनॉल बनाने की वन जी टेक्नोलॉजी से. जबक‍ि अगर इंडस्ट्री इसकी टूजी टेक्नोलॉजी से इथेनॉल बनाएं तो सीधे अनाज की बजाय एग्रीकल्चरल वेस्ट से इसे आसानी से बनाया जा सकता है, ज‍िसमें पराली की समस्या भी खत्म होगी. लेक‍िन इंडस्ट्री इथेनॉल बनाने की अपनी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने की बजाय सीधे क‍िसानों पर ही सवाल खड़े कर रही है. 

कैसे खर्च होता है 10,000 लीटर पानी?

भारत में 1 किलोग्राम चावल उगाने के लिए लगभग 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबक‍ि 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए लगभग 2.5 किलोग्राम चावल की खपत होती है. इसी तरह 2.5 किलो चावल से 1 लीटर इथेनॉल बनता है. इस तरह एक लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से अध‍िक पानी खर्च हो जाता है. पूसा के तत्कालीन डायरेक्टर अशोक कुमार स‍िंह ने भी कहा था क‍ि 1 हेक्टेयर धान की खेती में पूरे सीजन के दौरान करीब 150 लाख लीटर पानी की खपत होती है.

एक हेक्टेयर में करीब 3000 क‍िलो चावल पैदा होता है. ऐसे में सीधा से गण‍ित है क‍ि एक क‍िलो चावल तैयार होने में 5000 लीटर पानी खर्च हो जाता है. अब अगर आप इस चावल से इथेनॉल बनाते हैं तो यही कहा जाएगा क‍ि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से अध‍िक पानी खर्च होता है. वो क‍िसान खर्च कर रहा हो या इंडस्ट्री. इससे क्या मतलब है.

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