यूक्रेन से गेहूं निर्यात रुकने से दुनिया में महंगाई बढ़ सकती हैदुनिया के गेहूं बाजार में एक बार फिर अनिश्चितता बढ़ गई है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच काला सागर (ब्लैक सी) क्षेत्र में बढ़ते तनाव और यूक्रेनी बंदरगाहों पर हो रहे हमलों ने वैश्विक अनाज आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों पर दिखने लगा है, जो जनवरी 2026 के स्तर की तुलना में करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं और पिछले दो साल के सबसे ऊंचे स्तर के आसपास पहुंच गई हैं.
हालांकि इस साल की शुरुआत में मध्य पूर्व में तनाव, ऊर्जा कीमतों में तेजी और खाद की लागत बढ़ने के बावजूद अनाज बाजार कुछ स्थिर बना हुआ था. लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं. दुनिया के कई हिस्सों में सूखे और ब्लैक सी क्षेत्र में निर्यात में रुकावट की आशंका ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है.
यूक्रेन दुनिया के प्रमुख कृषि निर्यातकों में शामिल है. गेहूं, मक्का और सूरजमुखी जैसे प्रोडक्ट के निर्यात में उसकी बड़ी हिस्सेदारी है. यूक्रेन के कृषि क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत समुद्री निर्यात ब्लैक सी के रास्ते होता है.
युद्ध के दौरान रूस द्वारा बंदरगाहों और निर्यात ढांचे पर किए जा रहे हमलों ने कृषि निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है. स्थिति ऐसी बन गई है कि कई इलाकों में कटाई के बाद अनाज गोदामों में जमा हो रहा है, लेकिन उसे बाजार तक पहुंचाने का रास्ता नहीं मिल पा रहा है.
यूक्रेन में इस समय गेहूं की कटाई चल रही है और अगले चरण में मक्के की फसल आने वाली है. ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या भंडारण क्षमता और नकदी की कमी की है.
कई किसानों का कहना है कि गोदाम लगभग भर चुके हैं और खरीददारों की संख्या भी कम हो गई है. निर्यात रुकने से स्थानीय बाजार में अनाज की अधिकता हो गई है, जिससे घरेलू कीमतों पर दबाव बना हुआ है. इसके कारण किसानों की आय प्रभावित हो रही है और अगले सीजन की बुवाई के लिए जरूरी पूंजी जुटाना मुश्किल हो रहा है.
वैश्विक बाजार में कीमतें मुख्य रूप से भविष्य की आपूर्ति को ध्यान में रखकर तय होती हैं. निवेशकों और व्यापारियों को आशंका है कि यदि ब्लैक सी रूट लंबे समय तक बाधित रहा तो दुनिया के कई आयातक देशों तक समय पर गेहूं नहीं पहुंच सकेगा.
इसके साथ ही यूरोप, एशिया और अन्य क्षेत्रों में सूखे की स्थितियों ने उत्पादन को लेकर भी चिंता बढ़ाई है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गेहूं के भाव लगातार मजबूत बने हुए हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन से गेहूं और मक्का की आपूर्ति प्रभावित होने का सबसे अधिक असर अफ्रीका और मध्य पूर्व के उन देशों पर पड़ सकता है, जो लंबे समय से यूक्रेनी अनाज पर निर्भर हैं.
यदि निर्यात में लंबे समय तक बाधा बनी रहती है, तो इन क्षेत्रों में खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में खाद्य सुरक्षा का संकट भी गहरा सकता है.
यूक्रेन को इस साल करीब 60 मिलियन टन अनाज उत्पादन की उम्मीद है, जो पिछले साल के बराबर माना जा रहा है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट का सबसे बड़ा असर अगले कृषि सीजन पर पड़ सकता है.
निर्यात से होने वाली आय प्रभावित होने पर किसानों के लिए बीज, ईंधन, खाद और मजदूरी का खर्च निकालना मुश्किल होगा. इससे अगले साल गेहूं और अन्य फसलों का रकबा घट सकता है, जिसका असर आगे चलकर वैश्विक आपूर्ति पर पड़ सकता है.
भारत वैश्विक गेहूं बाजार में एक महत्वपूर्ण उत्पादक देश है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है. यदि वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है तो आयातक देशों की खरीद गतिविधियां बढ़ेंगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें और मजबूत हो सकती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल वैश्विक बाजार की निगाहें ब्लैक सी क्षेत्र की स्थिति पर टिकी हैं. यदि यूक्रेन के लिए वैकल्पिक निर्यात रूट तेजी से नहीं खोले गए, तो आने वाले महीनों में गेहूं बाजार में उतार-चढ़ाव और खाद्य महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं.
कुल मिलाकर, ब्लैक सी में बढ़ता तनाव केवल यूक्रेन की समस्या नहीं है. यह दुनिया की खाद्य आपूर्ति, गेहूं की कीमतों और करोड़ों उपभोक्ताओं की रसोई पर असर डालने वाला वैश्विक मुद्दा बनता जा रहा है.(इनपुट/रॉयटर्स)
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