खरीफ फसलों की बुवाई में कमीदेश में जून के महीने में मॉनसून की सुस्त रफ्तार और सूखे के हालात ने खरीफ फसलों की बुवाई को तगड़ा झटका दिया है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल 5 जुलाई तक देश में खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले लगभग 92 लाख हेक्टेयर पिछड़ गया है. 4 जून से 4 जुलाई तक सामान्य से करीब 33 फीसदी कम बारिश के चलते मिट्टी में नमी की भारी कमी रही, जिससे किसानों को बुवाई टालनी पड़ी. इसका सबसे गंभीर असर देश की मुख्य नकदी फसल सोयाबीन और धान पर पड़ा है, जिनकी बुवाई में भारी गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, जुलाई की शुरुआत में मॉनसून के एक्टिव होने से उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन कृषि विशेषज्ञों ने देर से होने वाली बुवाई के कारण फसलों की पैदावार घटने की चिंता जताई है.
इस साल अल नीनो के असर को लेकर मौसम वैज्ञानिक भी चिंता जता रहे हैं. अगर आने वाले दिनों में मॉनसून ने रफ्तार नहीं पकड़ी और अच्छी बारिश नहीं हुई, तो खरीफ फसलों का उत्पादन कम हो सकता है. इसका मतलब है कि बाजार में अनाज, दालें और खाद्य तेल जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई घट सकती है, जिससे इनके दाम बढ़ने की आशंका है. अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ किसानों पर ही नहीं, बल्कि हर आम आदमी की रसोई और जेब पर भी पड़ेगा. यानी मौसम की बेरुखी जारी रही, तो आने वाले महीनों में किसानों की चिंता के साथ-साथ आम लोगों की थाली भी महंगी हो सकती है.
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल धान की रोपाई 60.24 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले साल इसी समय तक यह 69.30 लाख हेक्टेयर थी. यानी इस साल धान का रकबा 9.06 लाख हेक्टेयर कम रहा. हालांकि, खरीफ सीजन अभी जारी है, इसलिए आने वाले दिनों में इसमें बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है.
दालों की बुवाई भी पिछले साल के मुकाबले धीमी रही है. इस साल 5 जुलाई तक 37.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दालों की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय में यह 47.49 लाख हेक्टेयर थी. यानी 10.34 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई. वहीं, अरहर का रकबा 21 लाख हेक्टेयर से घटकर 12.35 लाख हेक्टेयर रह गया है. इसके अलावा उड़द की बुवाई 4.63 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.01 लाख हेक्टेयर और मूंग का रकबा 17.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.81 लाख हेक्टेयर रहा है. वहीं, मोठ की बुवाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
श्री अन्न यानी मोटे अनाज की बुवाई भी पिछले साल की तुलना में कम हुई है. इस वर्ष 60.12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोटे अनाज की खेती हुई है, जबकि पिछले साल यह 71.86 लाख हेक्टेयर थी. वहीं, सबसे अधिक गिरावट बाजरा में दर्ज की गई है, जिसका रकबा 30 लाख हेक्टेयर से घटकर 20.82 लाख हेक्टेयर रह गया. साथ ही मक्का की खेती भी 35 लाख हेक्टेयर से घटकर 32.94 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गई है.
तिलहनों की बुवाई में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली है. इस साल 66.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में तिलहन की खेती हुई है, जबकि पिछले साल इसी समय में यह 109.27 लाख हेक्टेयर थी. यानी 42.96 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है. इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह सोयाबीन की खेती में कमी है. सोयाबीन का रकबा 79.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर रह गया है. वहीं, मूंगफली का रकबा भी 28 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.93 लाख हेक्टेयर पर आ गया है. हालांकि, सूरजमुखी और अरंडी की बुवाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
देश में कपास की बुवाई भी पिछले साल की तुलना में कम रही है. इस वर्ष 63.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती हुई, जबकि पिछले साल इसी समय तक यह 82 लाख हेक्टेयर थी. यानी करीब 18.82 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है.
जहां कई फसलों का रकबा घटा है. वहीं, गन्ने की खेती में बढ़ोतरी देखने को मिली है. इस साल 57.58 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह 56.72 लाख हेक्टेयर थी. यानी 0.85 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है. इसी तरह जूट और मेस्टा का रकबा भी 6.16 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.28 लाख हेक्टेयर हो गया है.
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