इंजीनियर ने मक्के के छिलके से बनाए कप, प्लेटमक्का जहां स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है, वहीं इसका छिलका अब पर्यावरण को प्लास्टिक मुक्त करने में अहम भूमिका निभा रहा है. अब मक्के का छिलका बेकार कचरा नहीं है, बल्कि वह आम जनमानस के उपयोग में आने वाला एक सामान बन चुका है. अब मक्के के इस छिलके से चाय के कप, प्लेट, कटोरी, ग्लास, स्ट्रॉ और झोला जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार कर सिंगल यूज प्लास्टिक का मजबूत विकल्प खोज लिया गया है. वहीं, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की छितरौली पंचायत अंतर्गत मुरादपुर निवासी इंजीनियर नाज ओजैर इससे अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार कर रहे हैं.
मुजफ्फरपुर के इंजीनियर नाज ओजैर मक्के के बेकार समझे जाने वाले छिलके से चाय के कप, प्लेट, कटोरी, ग्लास, स्ट्रॉ और झोला जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार कर रहे हैं. वहीं, उनके वर्षों की कड़ी मेहनत से मिले इस नवाचार (इनोवेशन) को केंद्र सरकार से पेटेंट भी हासिल हो चुका है. इसके बल पर उन्होंने एमएनओ स्वदेशी इंडिया प्रा. लि. नाम से अपना स्टार्टअप शुरू किया है. इस तकनीक के लिए उन्होंने 1 मार्च 2019 को पेटेंट का आवेदन किया था, जिसके बाद 21 फरवरी 2024 को उन्हें आधिकारिक पेटेंट प्रमाण पत्र हासिल हुआ. पेटेंट मिलने के बाद 26 मई 2026 को उन्होंने अपने स्टार्टअप की स्थापना की और उत्पादन शुरू किया.
इंजीनियर नाज अपने बीते हुए संघर्ष के दिनों को बताते हुए कहते हैं कि सफलता का सफर इतना आसान नहीं था. प्लास्टिक के बर्तनों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को देखते हुए उन्होंने करीब पांच वर्षों तक बांस, केला और पपीते के रेशों पर शोध किया. इसके बाद उन्होंने मक्के के छिलके पर काम शुरू किया. उसे एक निश्चित तापमान पर गर्म करके ढालने की तकनीक खोजी. अपने इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि एक बार आकार में ढल जाने के बाद मक्के के छिलके के बर्तन अपना आकार नहीं बदलते हैं. इसके बाद उनकी मेहनत का परिणाम मिलना शुरू हुआ.
इंजीनियर नाज कहते हैं कि आगामी 10 वर्षों में सिंगल यूज प्लास्टिक से बने कम से कम 100 उत्पादों को पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों से बदलने की योजना है. वहीं, उनका कहना है कि मक्के के छिलके से तैयार होने वाले उत्पादों से केवल उनकी कमाई नहीं होती है, बल्कि इससे किसानों को भी कमाई हो रही है. वह मक्के का छिलका 1 से 2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से किसानों से खरीदते हैं.
वहीं, एक उत्पाद को बनाने में करीब 40 से 50 पैसे की लागत आती है, जबकि कटोरी जैसे उत्पाद को वह 2 रुपये प्रति पीस बेचते हैं. सालाना करीब 5 लाख रुपये की कमाई हो रही है. उनकी छोटी-सी फैक्ट्री में आठ स्थानीय लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराया गया है.
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण)/लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले नवाचार को प्रोत्साहित किया जा रहा है. वहीं, ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के नवाचार बिहार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं. मक्के के छिलके से पर्यावरण-अनुकूल बर्तन बनाना बेहद सराहनीय और अनुकरणीय प्रयास है.
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