
परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच अब किसान बागवानी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. सरकार भी किसानों को बागवानी आधारित खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. इसी बदलाव की मिसाल बने हैं इंदौर संभाग के नानाखेड़ा माफी गांव के प्रगतिशील किसान लखन यादव, जिन्होंने पारंपरिक फसलों की बजाय जैविक तरीके से नींबू की खेती को अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है.
आज लखन यादव करीब 10 एकड़ क्षेत्र में नींबू की बागवानी कर रहे हैं. उन्होंने पांच एकड़ में बालाजी किस्म और पांच एकड़ में कागजी नींबू की खेती की है. उनकी यह पहल आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है.
लखन यादव बताते हैं कि नींबू एक ऐसी बागवानी फसल है, जो किसानों को लंबे समय तक नियमित आय का स्रोत प्रदान करती है. एक बार पौध लगाने के बाद लगभग 25 से 30 वर्षों तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.उन्होंने प्रति एकड़ लगभग 140 पौधे लगाए हैं और वर्तमान में प्रत्येक पौधे से 25 से 30 किलोग्राम तक नींबू का उत्पादन मिल रहा है.
हालांकि नींबू में साल में दो बार उत्पादन लेने की संभावना रहती है, लेकिन लखन यादव केवल गर्मी के मौसम में ही फसल लेते हैं. उनका कहना है कि सर्दियों में बाजार में नींबू के दाम काफी कम हो जाते हैं, जबकि गर्मी में इसकी मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती हैं. यही वजह है कि वे बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन की रणनीति अपनाते हैं.
किसान लखन यादव के बगीचे से हर साल लगभग 35 टन नींबू का उत्पादन प्राप्त होता है. उनके नींबू स्थानीय बाजार में औसतन 40 से 45 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बिकते हैं.इस तरह उन्हें प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा प्राप्त हो जाता है.
वे बताते हैं कि नींबू की फसल का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इसमें अन्य फसलों की तुलना में रोग और कीटों का प्रकोप कम होता है. साथ ही पशुओं से भी फसल को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता. यही कारण है कि वे पूरी तरह जैविक पद्धति से खेती कर रहे हैं.
लखन यादव केवल नींबू पर ही निर्भर नहीं हैं। वे बागवानी के साथ-साथ सहफसली खेती भी करते हैं. नींबू के पौधों के बीच वे अदरक, हल्दी और रेड लेडी किस्म के पपीते की खेती करते हैं. इससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है.
उनका कहना है कि सहफसली खेती से मिलने वाली आमदनी से मजदूरी, सिंचाई और अन्य कृषि खर्च आसानी से निकल जाते हैं.परिणामस्वरूप नींबू की खेती से होने वाला वास्तविक मुनाफा और अधिक बढ़ जाता है.
लखन यादव अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहते. वे नींबू से बनने वाले उत्पादों के जरिए मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) पर भी काम कर रहे हैं. इस वर्ष उन्होंने नींबू का अचार बनाने की योजना तैयार की है.
उनका मानना है कि सर्दियों में जब नींबू के दाम कम हो जाते हैं, तब अचार और अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार करके बेहतर लाभ कमाया जा सकता है. बाजार में नींबू के अचार की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है.
प्रगतिशील किसान लखन यादव की सफलता यह साबित करती है कि यदि किसान बाजार की मांग को समझकर बागवानी, जैविक खेती और वैल्यू एडिशन को अपनाएं तो कम क्षेत्र में भी अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं. उनकी यह पहल न केवल आर्थिक रूप से लाभदायक है, बल्कि टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल कृषि मॉडल भी प्रस्तुत करती है.
बदलते कृषि परिदृश्य में लखन यादव जैसे किसान यह संदेश दे रहे हैं कि परंपरागत खेती के साथ नवाचार और बागवानी का समन्वय किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी रास्ता बन सकता है.
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