
क्या इथेनॉल से किसानों को मिल रहा है फायदा? पिछले कुछ महीनों से देश के सियासी और आर्थिक गलियारों में इथेनॉल चर्चा का विषय बना हुआ है. एयरकंडीशन कमरों में बैठने वाले बड़े-बड़े नीति निर्माताओं से लेकर सरकार का झंडा उठाने वाले कुछ 'जेबी' किसान संगठनों तक, सब एक सुर में अलाप रहे हैं कि देश का किसान अब सिर्फ पेट भरने वाला 'अन्नदाता' नहीं रहा. वह अब गाड़ियों की टंकी में ईंधन भरने वाला 'ऊर्जादाता' भी बन चुका है. दावा किया जा रहा है कि इस 'इथेनॉल' से किसानों को बहुत फायदा मिला है. उनकी किस्मत बदल गई है. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? या फिर 'ऊर्जादाता' के इस फैंसी, चमकीले और आकर्षक चश्मे के पीछे खेत में हाड़-मांस गलाने वाले किसान की आंखों के आंसू छिपाए जा रहे हैं? क्या इथेनॉल सच में किसान की जेब भरने के लिए है, या फिर यह किसानों के कंधों का इस्तेमाल करके कंपनियों और मिल मालिकों की तिजोरी चमकाने का एक नया जरिया है?
इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक भाषण में नहीं, बल्कि खुद केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय की फाइलों में दबे पड़े हैं. मंत्रालय की ही एक आधिकारिक रिपोर्ट और 'एगमार्कनेट' के ताजा आंकड़े इस क्रांति की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं. आइए, इस पूरी 'इथेनॉल इकोनॉमी' की परतों को एक-एक करके उखाड़ते हैं और समझते हैं कि ग्राउंड जीरो पर किसान के साथ क्या खेल हो रहा है.
इथेनॉल नीति का सबसे बड़ा ढिंढोरा मक्के की फसल को लेकर पीटा गया था. किसानों से कहा गया था कि मक्के की बंपर पैदावार करो, देश को इथेनॉल की जरूरत है, तुम्हें मुंहमांगा दाम मिलेगा. किसानों ने सरकार पर भरोसा किया और मक्के का रिकॉर्ड उत्पादन कर डाला. लेकिन बदले में बाजार ने उन्हें क्या दिया?
कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2025 से लेकर अगस्त 2026 तक के पिछले 18 महीनों में एक भी महीना ऐसा नहीं बीता, जब मंडियों में मक्के का औसत भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की रेखा को छू भी पाया हो. एमएसपी से कम दाम मिलने का मतलब है फसलको घाटा सहकर बेचना.


मार्च 2025 में जब मक्के का सरकारी दाम यानी एमएसपी 2225 रुपये प्रति क्विंटल था, तब मंडियों में किसान को औसतन 2176.61 रुपये का भाव मिला. नवंबर 2025 का महीना भारतीय कृषि इतिहास में नीतिगत नाकामी का एक बड़ा उदाहरण है. इस महीने मक्के का दाम गिरकर मात्र 1634.74 रुपये प्रति क्विंटल रह गया. तब एमएसपी 2400 रुपये था. यानी किसान को प्रति क्विंटल 765 रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ा. अगस्त 2026 की मौजूदा हकीकत को भी जान लीलिए. मक्का आज भी एमएसपी से करीब 391 रुपये नीचे 2008.69 रुपये पर पिट रहा है.
सवाल यह है कि अगर इथेनॉल की इतनी ही भारी मांग है, तो मंडियों में मक्के का रेट लगातार डेढ़ साल से डाउन क्यों है? इसका जवाब सरकार के एक और दोहरे खेल में छिपा है. सरकार ने इथेनॉल कंपनियों की लागत कम करने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से महज 23.20 रुपये प्रति किलो के बेहद सस्ते भाव पर कंपनियों को चावल जारी कर दिया. यह एमएसपी पर किसानों से खरीदे गए धान (24.41 रुपये प्रति किलो) से भी कम कीमत है.
जब डिस्टिलरीज को बैठे-बिठाए सरकार से सस्ता चावल मिलने लगा, तो उन्होंने मंडियों से किसानों का मक्का खरीदना बंद कर दिया. ऊपर से उद्योगों के दबाव में मक्के के आयात की भी ढील दे दी गई. नतीजा? कंपनियों का मुनाफा सुरक्षित रहा और मक्का किसान मंडियों में व्यापारियों से लुटता रहा.
मक्के से इतर, देश का गन्ना किसान भी इस क्रांति का एक और पीड़ित किरदार है. चीनी मिलें गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेस (शीरे) से बड़े पैमाने पर इथेनॉल बना रही हैं और इसे तेल कंपनियों को बेचकर भारी मुनाफा कूट रही हैं. लेकिन इस मुनाफे में से किसान के हिस्से क्या आ रहा है? जवाब है जीरो.
हकीकत यह है कि आज भी गन्ने का मूल्य तय करने का एकमात्र पैमाना शुगर रिकवरी ही है. गन्ने की कीमत तय करने वाले सरकारी फॉर्मूले में चीनी मिलों को इथेनॉल से होने वाली कमाई को कोई 'कंपोनेंट' या हिस्सा बनाया ही नहीं गया है. मिलें गन्ने से चाहे चीनी बनाएं या सीधे इथेनॉल, किसान को केवल उसके गन्ने के वजन और शुगर रिकवरी के आधार पर ही दाम मिलता है. इसी वजह से गन्ना किसान सरकार और मिलों से यह मांग कर रहा है कि चूंकि हमारी फसल से इथेनॉल के रूप में अतिरिक्त उत्पाद और अतिरिक्त मुनाफा कमाया जा रहा है, इसलिए हमें 'इथेनॉल प्रीमियम' या अतिरिक्त बोनस दिया जाए.
गन्ना किसान प्रति लीटर इथेनॉल पर अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं, लेकिन सरकार इस मांग को अनसुना किए बैठी है. सरकार जो एकमात्र तर्क देती है वो ये कि इथेनॉल की वजह से मिलों के पास कैश आता है, जिससे किसानों का भुगतान जल्दी हो जाता है. अब सवाल यह है कि समय पर भुगतान पाना किसान का कानूनी अधिकार है या कोई एहसान? अतिरिक्त मुनाफे का पैसा सिर्फ मिल मालिकों की जेब में क्यों जा रहा है? उसमें किसानों को कब हिस्सा मिलेगा?
इस पूरी व्यवस्था के बीच सबसे ज्यादा चौंकाने वाली भूमिका उन 'जेबी' किसान नेताओं और उनके संगठनों की है, जो इथेनॉल को किसानों के लिए मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं. किसी भी नीति का समर्थन या विरोध करना किसान नेताओं और उनके संगठनों का अपना अधिकार है. लेकिन उनसे इन चार सवालों के जवाब जरूर चाहिए.
क्या इन किसान मसीहाओं को कृषि मंत्रालय का यह आधिकारिक डेटा दिखाई नहीं देता कि मक्का उत्पादक किसान डेढ़ साल से घाटा खा रहा है? अगर इथेनॉल से इतनी ही बड़ी क्रांति आ गई थी, तो नवंबर 2025 में किसान को 1634 रुपये का भाव क्यों मिला? इस लूट पर इन नेताओं ने कभी आंदोलन क्यों नहीं किया? सरकार को पत्र क्यों नहीं लिखा?
इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरीज को तेल कंपनियों से प्राइस प्रोटेक्शन यानी तय और गारंटेड मुनाफे वाले दाम की लिखित सुरक्षा मिली हुई है. उनका दाम फिक्स है ताकि कंपनियां घाटे में न जाएं. लेकिन इन कंपनियों को कच्चा माल देने वाले किसान की फसल, खासतौर पर मक्के के दाम के लिए कोई कानूनी गारंटी क्यों नहीं है? यह दोहरा रवैया क्यों?
फसलों के दाम और एमएसपी तो इथेनॉल आने से पहले भी हर साल बढ़ रहे थे और आज भी बढ़ रहे हैं. धान, मक्का या गन्ना किसी भी फसल पर आज किसानों को इथेनॉल के नाम पर एमएसपी के ऊपर एक रुपये भी एक्स्ट्रा या बोनस नहीं मिल रहा है. जब देश में फसलों की खरीद और दाम में बढ़ोतरी पहले भी हो रही थी और यह इथेनॉल की मोहताज नहीं है, तो फिर इस सामान्य प्रक्रिया का श्रेय इथेनॉल को क्यों दिया जा रहा है?
अगर यह नीति वाकई किसान-केंद्रित है, तो सरकार 'प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल' यानी मुनाफे में हिस्सेदारी क्यों नहीं लागू करती? डिस्टिलरीज को तेल कंपनियों से मिलने वाले प्रति लीटर इथेनॉल के दाम का एक निश्चित हिस्सा सीधे फसल उगाने वाले किसान के खाते में क्यों नहीं भेजा जाता? अब तक ऐसा कोई इंतजाम नहीं हुआ है, फिर कैसे इथेनॉल को किसानों के लिए क्रांतिकारी बताया जा रहा है.
बहरहाल, केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों से एक बात पूरी तरह साफ हो जाती है: भारत की मौजूदा इथेनॉल नीति पूरी तरह से उद्योग-केंद्रित है. इथेनॉल से मिलने वाले लाभ में किसानों की कोई हिस्सेदारी नहीं दिख रही है. सरकार ने एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है जिसमें रिस्क पूरी तरह से किसान का है और रिटर्न पूरी तरह से इथेनॉल कंपनियों का. किसान ने मक्का का उत्पादन बढ़ाकर अपना फर्ज पूरा किया, लेकिन नीतिगत खामियों, सस्ते चावल की डंपिंग और मक्के के आयात जैसे फैसले ने उसकी कमर तोड़ दी.
जब तक सरकार मंडियों में एमएसपी पर मक्के की 100 गारंटेड खरीद सुनिश्चित नहीं करती और गन्ने के मूल्य निर्धारण में इथेनॉल को एक अनिवार्य कंपोनेंट बनाकर किसानों को बोनस नहीं देती, तब तक अन्नदाता से ऊर्जादाता का नारा केवल इथेनॉल कंपनियों की मार्केटिंग का टूल मात्र बना रहेगा. देश का मक्का किसान आज भी अपनी फसल के सही दाम के लिए परेशान हो रहा है.
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