'इंस्पेक्टर राज' पर बंद का ऐलान (सांकेतिक तस्वीर)देशभर में हर साल खेती के सीजन के दौरान किसानों को खाद, बीज और अन्य कृषि इनपुट की सप्लाई में गड़बड़ी, मिलावट और बंडलिंग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इन चुनौतियों का सीधा असर किसानों की लागत और उत्पादन पर पड़ता है. इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र सरकार ने निगरानी और प्रवर्तन को सख्त किया है, लेकिन इस कदम ने अब एग्री-इनपुट सेक्टर में विरोध को जन्म दे दिया है. महाराष्ट्र फर्टिलाइजर्स, पेस्टिसाइड्स एंड सीड्स डीलर्स एसोसिएशन (MAFDA) और ऑल इंडिया डीलर एसोसिएशन (AIDA) ने अनिश्चितकालीन बंद का ऐलान किया है. इसके समर्थन में 10 बड़े उद्योग संगठनों ने 27 अप्रैल को एक दिन के शटडाउन का निर्णय लिया है, जिसमें हजारों मैन्युफैक्चरर्स और बड़ी संख्या में डीलर्स-डिस्ट्रीब्यूटर्स के शामिल होने की बात कही जा रही है. ऐसे में बुवाई और फसल प्रबंधन के अहम समय पर किसानों को खाद-बीज और अन्य इनपुट समय पर नहीं मिलने की आशंका बढ़ गई है.
खाद्य सुरक्षा और महाराष्ट्र में किसानों की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए प्रशासन ने निरीक्षण और कार्रवाई की प्रक्रिया को तेज किया है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को सही समय पर गुणवत्तापूर्ण खाद, बीज और कीटनाशक उपलब्ध हों. लंबे समय से किसानों की ओर से मिलावट, घटिया उत्पाद और जबरन बंडलिंग की शिकायतें सामने आती रही हैं. बीते साल राज्य में सोयाबीन बीज फेल होने की घटनाओं ने भी इन चिंताओं को और बढ़ाया था. ऐसे मामलों में किसानों को सीधे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, जिसे रोकने के लिए सख्ती को जरूरी कदम माना जा रहा है.
दूसरी ओर, एग्री इनपुट इंडस्ट्री के डीलर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स और मैन्युफैक्चरर्स का कहना है कि सख्ती अब “इंस्पेक्टर राज” जैसे माहौल में बदल रही है. उद्योग संगठनों ने कहा कि ग्राउंड लेवल पर बढ़ती जांच, कार्रवाई का डर और नकारात्मक माहौल के कारण सामान्य कारोबार प्रभावित हो रहा है. इससे वैध कारोबार करने वाले भी दबाव महसूस कर रहे हैं, जिससे सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है.
एग्री-इनपुट सेक्टर में बंद और विरोध का सबसे बड़ा असर किसानों पर ही पड़ने की आशंका है. खासकर उन क्षेत्रों में जहां बुवाई या फसल प्रबंधन का समय चल रहा है, वहां इनपुट की थोड़ी भी देरी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है. समय पर खाद और बीज न मिलने से किसानों को वैकल्पिक और महंगे विकल्पों का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे उनकी लागत बढ़ सकती है.
उद्योग संगठनों का कहना है कि सोर्स रजिस्ट्रेशन में देरी, नए उत्पादों की मंजूरी में बाधाएं और लाइसेंसिंग प्रक्रिया पहले से ही जटिल रही है. अब बढ़ी हुई निगरानी के चलते दबाव और बढ़ गया है.
उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी बैच का एक हिस्सा गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो जाता है तो पूरे बैच और संबंधित कारोबारियों पर कार्रवाई का खतरा बना रहता है, जबकि कई बार इसके पीछे स्टोरेज, मौसम या हैंडलिंग जैसी व्यावहारिक वजहें होती हैं.
मामले को लेकर उद्योग प्रतिनिधियों ने महाराष्ट्र के कृषि मंत्री से बैठक की मांग की है, ताकि किसानों और कृषि-उद्यमियों दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित समाधान निकाला जा सके.
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