इजराइल-ईरान जंग का असर, भारत की खेती पर कितना बढ़ेगा बोझ?

इजराइल-ईरान जंग का असर, भारत की खेती पर कितना बढ़ेगा बोझ?

इजराइल-ईरान युद्ध के कारण भारतीय खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती फर्टिलाइजर की सप्लाई और बढ़ती कीमतों को लेकर है. भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों और उसके आसपास के रास्तों से आयात करता है, लेकिन युद्ध की वजह से 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' जैसे समुद्री रास्तों में रुकावट आने से यूरिया, DAP और पोटाश की खेप पहुंचने में देरी हो सकती है.

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इजराइल-ईरान जंग का असर, भारत की खेती पर कितना बढ़ेगा बोझ?किसानों पर इजराइल-ईरान जंग का असर

वर्तमान में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की कृषि व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. इस युद्ध का सबसे विनाशकारी असर वैश्विक 'सप्लाई चेन' यानी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है, जिसकी वजह से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, विशेषकर यूरिया की उपलब्धता में भारी कमी आई है. जब आपूर्ति बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें अचानक बढ़ने लगती हैं, जिसका सीधा बोझ भारत जैसे कृषि प्रधान देशों पर पड़ता है. भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए एक बड़ी सीमा तक विदेशी आयात पर निर्भर है, और जब भी वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, तो हमारे छोटे और सीमांत किसानों के सामने फसल की लागत बढ़ने और उत्पादकता घटने का दोहरा संकट खड़ा हो जाता है. यह स्थिति न केवल किसानों की आर्थिक कमर तोड़ती है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा के लिए एक अलार्म की तरह है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में अनाज की कमी और महंगाई को दावत देना होगा. 

भारत की विदेशी फर्टिलाइजर पर भारी निर्भरता

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो स्थिति काफी चिंताजनक है, क्योंकि दुनिया की कुल उर्वरक आपूर्ति का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों से आता है. सबसे बड़ी भौगोलिक चुनौती यह है कि इस आपूर्ति का एक-तिहाई हिस्सा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' जैसे संवेदनशील समुद्री रास्तों से होकर गुजरता है, जो युद्ध की स्थिति में कभी भी बंद हो सकते हैं. भारत अपनी जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक यूरिया और फॉस्फेट उर्वरक इन्हीं पश्चिम एशियाई देशों से मंगाता है, ऐसे में वहां होने वाला कोई भी छोटा संघर्ष सीधे तौर पर भारतीय खेतों तक पहुंचने वाली खाद की बोरी को असर डालता है, विशेषज्ञों का मानना है कि अब खेती केवल मौसम या अच्छे मॉनसून का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह गहराई से 'जियो-पॉलिटिक्स' यानी वैश्विक राजनीति से जुड़ चुकी है. अगर आपूर्ति में बाधा आती है, तो इसका सीधा असर फसल की बुवाई, उसकी गुणवत्ता और अंततः बाजार में अनाज की कीमतों पर पड़ता है. 

संकट के समय घबराहट नहीं, वैज्ञानिक समाधान अपनाएं

इस विकट परिस्थिति में आईसीएआर का केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजय अरोड़ा ने किसानों के लिए एक बहुत ही अहम और व्यावहारिक समाधान पेश किया है. डॉ. अरोड़ा का स्पष्ट मानना है कि किसानों को मौजूदा खाद संकट से घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें अब पारंपरिक तरीकों को छोड़कर आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों की ओर मुड़ना होगा. उनके अनुसार, समाधान केवल बाजार में खाद की उपलब्धता में नहीं, बल्कि उसके कुशल उपयोग में छिपा है. 

डॉ. अरोड़ा जोर देकर कहते हैं कि हमें अब 'इनपुट-आधारित' कृषि में केवल ज्यादा खाद डालने पर जोर रहता है. इससे हटकर 'ज्ञान-आधारित' कृषि की ओर बढ़ना होगा. उनका विजन है कि भविष्य की खेती ऐसी हो जहां किसान कम से कम संसाधन और कम खाद का इस्तेमाल करके भी अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण पैदावार प्राप्त कर सकें. यह बदलाव न केवल पर्यावरण के लिए अच्छा है, बल्कि युद्ध जैसी स्थितियों में किसानों को आत्मनिर्भर भी बनाता है. 

मिट्टी परीक्षण और खाद प्रबंधन सटीक तकनीकी सलाह

डॉ. संजय अरोड़ा का कहना है कि किसानों को सबसे पहले अपने खेतों का मिट्टी परीक्षण अनिवार्य रूप से कराना चाहिए. वे बताते हैं कि कई बार मिट्टी में फास्फोरस और पोटाश जैसे तत्व पहले से पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में किसान उन पर अनावश्यक पैसा खर्च करते हैं. खाद डालने के तरीके पर डॉ. अरोड़ा एक क्रांतिकारी बदलाव की बात करते हैं. वे कहते हैं कि यूरिया का पूरे खेत में छिड़काव के बजाय उसे सीधे पौधों की जड़ के पास डालें. इस छोटे से बदलाव से 30 से 40 प्रतिशत तक उर्वरक की बचत की जा सकती है.

इसके साथ ही वे रासायनिक खादों के विकल्प के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट और बायो-फर्टिलाइजर जैसे राइजोबियम और एजोटोबैक्टर के उपयोग को बढ़ाने की वकालत करते हैं. संस्थान द्वारा विकसित जीवाणु खादो जैसे हेलो-एज़ो, हेलो-पीएसबी या हेलो-जिंक के उपयोग से भी किसान रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमामल को कम कर सकते हैं और मिट्टी की ताकत को बरकरार रखते हुए अधिक और गुणवत्ता युक्त उत्पादन ले सकेंगे. ये समय की मांग है. उनके अनुसार, अगर किसान अपनी फसल चक्र में मूंग, उड़द और चना जैसी दलहनी फसलों को शामिल करें, तो मिट्टी में नाइट्रोजन की प्राकृतिक मात्रा बढ़ जाएगी और पैदावार घटाए बिना खाद की लागत में 25 प्रतिशत तक की भारी कमी आएगी. 

आत्मनिर्भर, टिकाऊ और स्मार्ट कृषि मॉडल

पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि भारत को अब खाद के मामले में आत्मनिर्भर होने की दिशा में युद्ध स्तर पर काम करना होगा. लंबी अवधि में केवल लचीली और टिकाऊ कृषि ही हमें वैश्विक झटकों से बचा सकती है. विशेषज्ञों और डॉ. अरोड़ा का मानना है कि हमें जीनोमिक्स, एआई (AI) और आधुनिक डेटा आधारित तकनीकों का सहारा लेकर ऐसी फसलें विकसित करनी होंगी जो कम नाइट्रोजन में भी बेहतर पैदावार दे सके.

समाधान केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है, इसके लिए सरकारी नीतियों में भी बड़े बदलाव की जरूरत है, जहां सब्सिडी को केवल खाद की खरीद तक सीमित न रखकर किसानों की 'दक्षता' और 'मिट्टी सुधार' से जोड़ा जाए. अगर हम डिजिटल कृषि और पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी को मजबूत करते हैं, तो यह संकट वास्तव में भारत के लिए अपने कृषि ढांचे को सुधारने और दुनिया के सामने एक 'आत्मनिर्भर कृषि मॉडल' पेश करने का एक बड़ा अवसर बन सकता है. 

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