भारत में खादों के इस्तेमाल का पैटर्न बदला, यूरिया से NPK की ओर मुड़े किसान

भारत में खादों के इस्तेमाल का पैटर्न बदला, यूरिया से NPK की ओर मुड़े किसान

भारत में खादों की खपत का पैटर्न बदल रहा है, जहां पारंपरिक यूरिया के बजाय संतुलित NPK खादों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे मिट्टी की सेहत सुधारने और फसल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल रही है.

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भारत में खादों के इस्तेमाल का पैटर्न बदला, यूरिया से NPK की ओर मुड़े किसानएनपीके खादों की मांग में तेज वृद्धि

भारत में खादों की खपत के रुझानों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. हाल ही में दो महीनों तक बिक्री में तेजी आने के बाद मई महीने में देश ने प्रमुख उर्वरकों जैसे यूरिया और डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की खपत पर नियंत्रण बनाए रखा है. यह खपत न केवल अनुमानित मांग से कम रही, बल्कि पिछले साल के इसी महीने की तुलना में भी गिरावट दर्ज की गई.

हालांकि, दूसरी ओर कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर यानी NPK (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश) आधारित खादों की बिक्री में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई. इनकी बिक्री में करीब 27 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जिससे कुल चार प्रमुख खादों की बिक्री पिछले साल के स्तर के बराबर बनी रही.

NPK की ओर बढ़ता भारत

भारत का खाद क्षेत्र अब एक रणनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है. दशकों तक खेती में नाइट्रोजन आधारित यूरिया पर अधिक निर्भरता रही, जिससे मिट्टी की क्वालिटी पर बेहद बुरा असर पड़ा. इस समस्या को देखते हुए अब सरकार और किसान दोनों संतुलित खाद उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

NPK खादों का उपयोग तेजी से बढ़ा है, और हाल के वर्षों में DAP और NPK के संयुक्त उत्पादन में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. यह बदलाव कृषि क्षेत्र में लंबे दिनों तक चलने वाले सुधार का संकेत माना जा रहा है.

मिट्टी की बिगड़ती सेहत

लगातार यूरिया के बहुत अधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता को नुकसान पहुंचाया. इसके समाधान के लिए सरकार ने “सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम” (SHC) जैसी योजनाएं शुरू कीं, जिससे किसानों को अपनी जमीन के अनुसार खादों का संतुलित उपयोग करने की सलाह मिली.

फसलों की बदलती जरूरत

देश में बागवानी, सब्जियों और नकदी फसलों की खेती बढ़ रही है. इन फसलों के लिए नाइट्रोजन के साथ-साथ फॉस्फोरस और पोटाश की भी जरूरत होती है, जिससे NPK उर्वरकों की मांग बढ़ी है.

सरकारी समर्थन से फायदा

सरकार की “न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS)” योजना के तहत फॉस्फेट और पोटाश आधारित खादों पर सब्सिडी दी जाती है. इसके अलावा, रसायन और उर्वरक मंत्रालय समय-समय पर विशेष पैकेज भी मंजूर करता है, ताकि इन खादों की कीमत किसानों के लिए किफायती बनी रहे.

संतुलित खेती पर जोर

“PM-PRANAM” जैसी योजनाएं केमिकल खादों के अत्यधिक इस्तेमाल को कम करने और फसलों में संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई हैं. इसमें जैविक खाद और अन्य विकल्पों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

बाजार का बढ़ता आकार

दुनिया भर में NPK उर्वरकों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और 2031 तक इसके 120 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है. भारत इस बाजार में एक महत्वपूर्ण खरीदार के रूप में उभर रहा है, जहां किसान प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक संतुलित खाद के उपयोग पर ध्यान दे रहे हैं.

घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी

यही वजह है कि पिछले एक दशक में भारत में फॉस्फेट और पोटाश (P&K) खादों का घरेलू उत्पादन 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुका है. साथ ही, इनकी उपलब्धता बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर एकमुश्त आयात (consortium imports) भी किए जा रहे हैं.

इन सभी बातों से साफ है कि भारत में यूरिया और डीएपी को किनारे कर किसानों में खाद के उपयोग का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. जहां पहले खेती मुख्य रूप से यूरिया पर निर्भर थी, वहीं अब किसान बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए NPK खादों की ओर रुख कर रहे हैं. सरकार की नीतियां और बदलती कृषि जरूरतें इस बदलाव को और तेजी दे रही हैं.

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