Banana Farming: कम जमीन में होगा तगड़ा मुनाफा, ऐसे करें टिशू कल्चर केले की हाई डेंसिटी खेती

Banana Farming: कम जमीन में होगा तगड़ा मुनाफा, ऐसे करें टिशू कल्चर केले की हाई डेंसिटी खेती

कम जमीन और सीमित साधनों में केले की खेती से बंपर मुनाफा कमाने के लिए टिशू कल्चर और हाइडेंसिटी तकनीक सबसे बेहतरीन फॉर्मूला है. आधुनिक टिशू कल्चर पौधों के इस्तेमाल से फसल न सिर्फ रोगमुक्त होती है, बल्कि तेजी से बढ़ती है. वहीं, हाइडेंसिटी बागवानी की मदद से छोटे से खेत में भी पारंपरिक तरीके के मुकाबले दोगुने से ज्यादा पौधे लगाए जा सकते हैं.

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Banana Farming: कम जमीन में होगा तगड़ा मुनाफा, ऐसे करें टिशू कल्चर केले की हाई डेंसिटी खेतीकेले की हाइडेंसिटी खेती

आज के दौर में जब खेती की जमीन लगातार कम हो रही है और पानी का संकट बढ़ता जा रहा है, पारंपरिक तौर-तरीकों को बदलना बेहद जरूरी हो गया है. भारत दुनिया में सबसे ज्यादा केला पैदा करने वाला मुल्क है, जहां हर साल करीब 36 से 38 मिलियन टन केले का उत्पादन होता है. लेकिन बढ़ती आबादी और खेती की बढ़ती लागत ने किसानों के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि कम जमीन से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कैसे कमाया जाए? इस मुश्किल घड़ी में 'सघन बागवानी' यानी हाई डेंसिटी प्लांटिंग तकनीक किसानों के लिए एक वरदान और बेहद असरदार वैज्ञानिक जरिया बनकर उभरी है. यह सिर्फ पौधों की तादाद बढ़ाने का तरीका नहीं है, बल्कि कम जमीन, कम पानी और कम लागत में ज्यादा पैदावार लेने का एक बेहतरीन जरिया है.

क्या है सघन बागवानी और इसकी खूबियां ?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, आम तौर पर किसान केले के पौधों को काफी दूरी पर लगाते हैं, जिससे खेत की बहुत सी जमीन खाली रह जाती है और मन मुताबिक पैदावार नहीं मिलती. इसके उलट, सघन बागवानी में वैज्ञानिक तौर पर तय की गई कम दूरी पर ज्यादा पौधे रोपे जाते हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मशहूर हो रही इस तकनीक में 'जोड़ा पंक्ति' का इस्तेमाल होता है, जिसमें दो कतारों को पास रखा जाता है और अगली दो कतारों के बीच खाली जगह छोड़ी जाती है. इससे पौधों को बराबर धूप और हवा मिलती है और खेत में घूमकर काम करना, खाद देना या फसलों की कटाई करना बेहद आसान हो जाता है.

उन्नत किस्में और क्ववालिटी लाजवाब

कृषि विश्वविद्यालयों के रिसर्च से यह साबित हो चुका है कि इस तकनीक को अपनाने से केले की पैदावार में 30 से 60 फीसदी तक का शानदार इजाफा हो सकता है. इस तरीके के लिए 'ग्रैंड नैन' और 'रोबस्टा' जैसी कावेन्डिश समूह की किस्में सबसे ज्यादा कामयाब और मुफीद मानी गई हैं. अगर किसान भाई पारंपरिक कंदों की जगह लैब में तैयार 'टिश्यू कल्चर पौधों का इस्तेमाल करें तो सभी पौधे एक बराबर बढ़ते हैं और उनके फल भी एक ही वक्त पर तैयार होते हैं. इस तरीके से एक हेक्टेयर में करीब 5,000 पौधे तक लगाए जा सकते हैं, जिससे फलों की क्वालिटी लाजवाब होती है और बाजार में उनकी मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती है.

ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन से बंपर पैदावार

डॉ सिंह के अनुसार, सघन बागवानी की कामयाबी के पीछे सबसे बड़ा हाथ ड्रिप सिंचाई और 'फर्टिगेशन' का है. केले की फसल को सालभर नमी की जरूरत होती है, लेकिन पुराने तरीके से पानी देने पर पानी और पैसे दोनों की भारी बर्बादी होती है. ड्रिप सिस्टम से न सिर्फ 35 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, बल्कि पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे फालतू खरपतवार नहीं उगते. इसी पानी के पाइप के जरिए जब घुलनशील खाद सीधे जड़ों में दी जाती है, जिसे फर्टिगेशन कहते हैं. इससे पौधों को पूरा पोषण मिलता है और बीमारियां लगने का खतरा भी बहुत कम हो जाता है.

कम वक्त में मोटा मुनाफा

इस वैज्ञानिक तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहां पुरानी खेती में फसल तैयार होने में 14 से 15 महीने का वक्त लगता था. वहीं, टिश्यू कल्चर और सघन बागवानी से फसल महज 11-12 महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. मेहनत और सही देखरेख से प्रति हेक्टेयर 60 से 80 टन और कई बार तो 90 टन से भी ज्यादा की बंपर पैदावार हासिल की जा सकती है. हालांकि, शुरुआत में ड्रिप सिस्टम और पौधों पर थोड़ा ज्यादा खर्च जरूर होता है, लेकिन एक साल के भीतर ही मिलने वाला तगड़ा मुनाफा उस खर्च की पूरी भरपाई कर देता है.

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