पहाड़ी राज्यों में अल नीनो का ज्यादा असरपहाड़ी राज्यों में जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के बीच कृषि उत्पादन को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं. हालिया अध्ययन के मुताबिक, अल नीनो के दौरान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की बारिश में कमी आ सकती है, जबकि इसके बाद सर्दियों में बारिश बढ़ने की संभावना रहती है. ऐसे में किसानों को बदलते मौसम के अनुसार खेती की रणनीतियों में बदलाव करने की जरूरत है.
कृषि वैज्ञानिकों की यह सलाह खास तौर पर हिमाचल प्रदेश के Kullu, Chamba, Una, Shimla और Sirmaur जिलों पर केंद्रित है, जहां अल नीनो का प्रभाव अधिक पाया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों के किसानों को विशेष सावधानी और योजना के साथ खेती करनी चाहिए.
पहाड़ी इलाकों में कम तापमान एक बड़ी चुनौती बना रहता है. इसलिए रबी और खरीफ दोनों फसलों की समय पर या थोड़ी जल्दी बुवाई करना उत्पादन बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. इसके साथ ही इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित खेती) को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है, जिसमें एक लंबी अवधि वाली मुख्य फसल के साथ मध्यम या अल्प अवधि की सहायक फसलें उगाई जाती हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार यदि मॉनसून देर से आता है, तो किसानों को 15 जुलाई के बाद मक्का की बुवाई नहीं करनी चाहिए. इसके बजाय चरी और बाजरा जैसी चारा फसलों को प्राथमिकता देनी चाहिए. वहीं धान की खेती केवल सिंचित क्षेत्रों या निचले इलाकों में ही करनी चाहिए, जहां पानी का पर्याप्त स्रोत उपलब्ध हो.
मॉनसून जल्दी खत्म होने की स्थिति में किसान सितंबर के बाद जल्दी पकने वाली फसलें जैसे भुवानी (तोरीया) या करण राई की खेती कर सकते हैं ताकि मिट्टी में बची नमी का सही उपयोग किया जा सके. सर्दियों में संभावित अच्छी बारिश को देखते हुए किसानों को समय पर गेहूं की बुवाई करने की सलाह दी गई है.
विशेषज्ञों के अनुसार, 20 अक्टूबर से नवंबर के पहले सप्ताह के बीच गेहूं की बुवाई सबसे बेहतर रहती है. इसके बाद बुवाई करने पर 20 से 35 प्रतिशत तक उपज में कमी आ सकती है.
तिलहन फसलों जैसे सरसों के लिए भी अलग-अलग किस्मों की सिफारिश की गई है. सामान्य बारिश की स्थिति में RCC-4 किस्म की सरसों को गेहूं के साथ उगाया जा सकता है, जबकि देर से बारिश होने पर Neelam और Him Sarson-1 जैसी कम अवधि वाली किस्मों का चयन बेहतर रहेगा.
बारानी (वर्षा आधारित) खेती वाले इलाकों में मिट्टी की नमी को बनाए रखने के लिए मल्चिंग और संरक्षण जुताई जैसी तकनीकों को अपनाना फायदेमंद हो सकता है. इसके साथ ही खादों का संतुलित और समयानुसार उपयोग भी जरूरी है.
फलदार पौधों जैसे आम, सेब और सिट्रस फलों पर भी अल नीनो का असर पड़ सकता है. ऐसे में जल संरक्षण उपायों को अपनाना जरूरी होगा. वहीं सब्जी उत्पादन को बनाए रखने के लिए शेड नेट और संरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड एग्रीकल्चर) को बढ़ावा देने की जरूरत है.
पानी की कमी की समस्या से निपटने के लिए स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो इरिगेशन तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया है, जिससे पानी का बेहतर उपयोग हो सके. कुल मिलाकर, बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों को सतर्क रहकर वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती करनी होगी, ताकि उत्पादन बनाए रखा जा सके और जोखिम को कम किया जा सके.
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